<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248</id><updated>2011-12-13T19:54:35.937-08:00</updated><title type='text'>INDIA GATE</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>27</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-116166939179493824</id><published>2006-10-23T22:55:00.000-07:00</published><updated>2006-10-23T22:56:31.816-07:00</updated><title type='text'>नारायणन अपने सुरक्षा सलाहकार हैं या पाक के</title><content type='html'>सत्ता के गलियारों में महीने भर से चर्चा थी। अब तो खबरें भी छपने लगी। सोमनाथ दादा की निगाह अब राष्ट्रपति पद पर हो गई। स्पीकर के रहते तो निष्पक्ष नहीं रहे। राष्ट्रपति हो गए। तो क्या होगा। अंदाज लगाना मुश्किल नहीं। एक बात लिखकर रख लीजिए। अगर सोमनाथ दादा राष्ट्रपति हो गए। अगर अफजल की फांसी पर कलाम फैसला करके नहीं गए। तो दादा का पहला फरमान फांसी माफी का होगा। अब उन लोगों की पहचान मुश्किल नहीं। जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा की कोई फिक्र नहीं। वैसे बृजेश मिश्र की जगह जेएन दीक्षित बने। तो सुरक्षा हलको ने सकून की सांस ली। वैसे मनमोहन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी बृजेश ही रहते। तो बुराई नहीं थी। बृजेश पुराने कांग्रेसी और इंदिरा गांधी के वफादार डीपी मिश्र के बेटे हैं। इतना ही नहीं। बृजेश मिश्र के दामाद इटालियन हैं। पर दीक्षित भी कोई बुरा विकल्प नहीं था। पर दीक्षित ज्यादा दिन रहे ही नहीं। सो जो कसर शुरु में रह गई थी। उसे मनमोहन ने दीक्षित की मौत के बाद पूरा कर लिया। एक रिटायर आईपीएस आफिसर को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना दिया। नारायणन की तारीफ बस इतनी। वह दक्षिण भारतीय दस जनपथ के करीब हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कितने एक्सपर्ट हैं नारायणन। जरा पिछले दो-चार महीने की बयानबाजी ही देख लीजिए। एक रात नारायणन के सपने में आया। देश के परमाणु संयंत्र खतरे में हैं। वह हड़बड़ी में उठे। और बयान दे डाला- 'परमाणु ऊर्जा संयंत्र आतंकवादियों के निशाने पर।' पूरे देश में हड़बड़ी मच गई। अपन को बृजेश मिश्र की याद आ गई। अगर ऐसा ही सपना बृजेश को आया होता। तो वह उठकर अपने दाएं हाथ के नाखूनों से बाएं हाथ पर चूंटी काटते। पहले तो सपना चेक करते। फिर खुद को किसी साइकेट्रिस्ट को दिखाते। सपनों का मतलब समझने की कोशिश करते। सपनों के एक्सपर्ट को बुलाते। उधर परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा का जायजा लेते। आईबी, रॉ, एमआई अफसरों को बुलाकर इनपुट लेते। नारायणन की तरह बयान हरगिज नहीं देते। सेना में आईएसआई के एजेंट तो कई बार पकड़े गए। जैसे इस इतवार को भी पकड़ा गया। पर अपने नारायणन ने नए तरह की दहशत फैलाई। एक दिन नारायणन को सपना आया। सुबह उठते ही उनने एक टीवी चैनल को इंटरव्यू देकर धमाकेदार खुलासा किया। बोले- 'भारतीय फौज में लश्कर-ए-तोईबा और अल कायदा के जासूस घुस आए।' तीनों फौजों के जनरलों ने फौरन खंडन किया। अपने रक्षा मंत्री प्रणव दा को भी खंडन करना पड़ा। पूरी फौज में खलबली मच गई। देश में दहशत हुई सो अलग। आखिर खोदा पहाड़, निकली चुहिया। वह भी मरी हुई। जम्मू कश्मीर के सुरक्षा बल में कोई ऐसा पूर्व आतंकी घुस आया था। जिसे कांग्रेस-पीडीपी सरकार ने माफी के बाद नौकरी दिलाई थी। इन्हीं फिसड्डी किस्म के रिटायर आईपीएस की हैसियत देखिए। पहले अमेरिका से परमाणु समझौता करवा दिया। अब पाकिस्तान से आतंकवाद पर ज्वाइंट मेकेनिज्म भी करवाया। अपने भोले पीएम से यह भी कहलवा दिया- 'पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार।' अब नारायणन का ताजा बयान देख लीजिए। बोले- 'मुंबई बम धमाकों में पाकिस्तान के खिलाफ सबूत तो बढ़िया हैं। पर पुख्ता सबूत नहीं।' अब आप ऐसे सबूत मुशर्रफ के सामने रखोगे। तो वह क्या कहेगा। मुशर्रफ कहेगा- 'पहले अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से पुष्टि करवा दीजिए।' अपने मनमोहन सिंह वहीं पर झाग की तरह बैठ जाएंगे। तो सुरक्षा सलाहकार महोदय मनमोहन सिंह की मदद कर रहे हैं। देश की मदद कर रहे हैं। या मनमोहन सिंह और देश दोनों का बंटाधार कर रहे हैं। पीएम से लेकर सुरक्षा सलाहकार तक। होम मिनिस्टर से लेकर डिफेंस मिनिस्टर तक। किसी में आत्मविश्वास नहीं रहा। जब से जार्ज फर्नांडिस चार्जशीटेड हुए। प्रणव दा का रक्षा मंत्रालय में मन नहीं लग रहा। अगर फेरबदल हुआ। कब तक टालेंगे मनमोहन। तो प्रणव दा शायद विदेश मंत्री हो जाएं। तब शायद शिवराज पाटिल की लॉटरी खुले। उन्हें रक्षा मंत्री के तौर पर आजमाया जाए। आने वाले दिनों में भारी सुरक्षा सौदे होंगे। इस समय पाटिल से ज्यादा दस जनपथ के करीब और कोई नहीं। फिसड्डी की बात छोड़िए। जब देश की आंतरिक सुरक्षा का बंटाधार कर दिया। तो सीमाओं की सुरक्षा भी क्यों बची रहे। कोई और बंटाधार नहीं कर सकता। तो पाटिल को ही भेज दो। अच्छा रहेगा। जब मिल बैठेंगे दीवाने दो। पाटिल और नारायणन की जोड़ी खूब जमेगी। अपन बात कर रहे थे नारायणन की। कभी-कभी अपन को लगता है। नारायणन भारत के सुरक्षा सलाहकार नहीं। अलबत्ता पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार हैं। आप ऊपर लिखे नारायणन के तीनों बयान फिर से पढ़िए। तीनों बयानो में उनने दहशत फैलाने का पाकिस्तानी मकसद पूरा किया। जब बाड़ ही खेत को खाने लगे। तो खेत का क्या होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-116166939179493824?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/116166939179493824/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=116166939179493824' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116166939179493824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116166939179493824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/10/blog-post_23.html' title='नारायणन अपने सुरक्षा सलाहकार हैं या पाक के'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-116115057566936384</id><published>2006-10-17T22:47:00.000-07:00</published><updated>2006-10-17T22:49:35.793-07:00</updated><title type='text'>प्रणव दा तो खफा थे, अब नौ सेनाध्यक्ष ने उड़ाई नींद</title><content type='html'>जिनने अपन का पंद्रह अक्टूबर वाला 'सरे राह चलते-चलते' पढ़ा होगा। उनको याद होगा। अपन ने बराक खरीद के सौदे पर सीबीआई की एफआईआर पर लिखा था। सीबीआई ने पूर्व सेनाध्यक्ष और पूर्व रक्षा मंत्री पर एफआईआर दायर की। तबके सेनाध्यक्ष सुशील कुमार ने बराक खरीद की सिफारिश की थी। तबके रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस ने बराक मिसाइलों की खरीद कराई थी। अपन को शुरु से ही यूपीए सरकार की यह बदले की कार्रवाई लगी। अपन ने लिखा था- 'सेना का आधुनिकीकरण रोकने की साजिश।' तो अपन ने यह नहीं सोचा था। मौजूदा नौ सेनाध्यक्ष भी ऐसा महसूस करते होंगे। पर अपन को यह शक जरुर था। आखिर सत्रह अक्टूबर को नौ सेनाध्यक्ष ने चुप्पी तोड़ दी। यूपीए सरकार के समय कुछ चीजें गौर करने लायक बन चुकी। पहले तीनों सेनाध्यक्षों ने मुस्लिम तुष्टीकरण पर आपत्ति की। अब नौ सेनाध्यक्ष ने बराक सौदे पर हुई एफआईआर पर नाराजगी जताई। उनने सोमवार को जुबान खोली। तो जमकर खोली। बोले- 'हम अपनी सेनाओं को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रहे हैं। अगर इस तरह हमें तैयारी में रोका जाएगा। तो यह चिंता का विषय है। हमें इस पर गंभीरता से सोचना होगा।' जब से यूपीए सरकार बनी। तब से जार्ज फर्नांडिस के खिलाफ साजिश शुरु हुई। जार्ज को यह पहले से पता था। सो उनने मई 2004 में ही अपने मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी। जिसमें उन ने लिखा- 'सोनिया गांधी ने कोफीन खरीद पर बहुत सवाल उठाए थे। चुनाव में मेरे खिलाफ खूब प्रचार हुआ। अब सरकार स्पीड से जांच कराए। ताकि दूध का दूध, पानी का पानी हो जाए।' अपन को रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी का बयान अभी नहीं भूला। उनने भरी लोकसभा में कहा था- 'किसी रक्षा सौदे में कोई घूसखोरी नहीं निकली।' इस पर प्रणव मुखर्जी की जान आफत में आ गई। उन्हें रक्षा मंत्री पद से रुखसत करने की चर्चा शुरु हुई। दस जनपथ तलब किया गया। जो नहीं चाहते थे। वह करना पड़ा। राजग सरकार के समय हुए सारे रक्षा सौदों की जांच सीबीआई को दे दी। प्रणव दा तबसे घुटन महसूस कर रहे थे। अब जब सीबीआई ने नौ अक्टूबर को एफआईआर की खबर प्रणव दा को दी। तो प्रणव दा बहुत परेशान हुए। सीबीआई ने खबर फैलाई- 'अबदुल कलाम ने यह कहा था। बराक अच्छी नहीं। फिर भी जार्ज फर्नांडिस ने बराक खरीदने का फैसला किया। नौ सेनाध्यक्ष सुशील कुमार से सिफारिशी चिट्ठी लिखवाई। अबदुल कलाम ने कहा था- थोड़ा इंतजार करिए। त्रिशूल तैयार हो जाएगा।' जिनने अपना संडे का कॉलम सरे राह पढ़ा होगा। उन्हें याद होगा। अपन ने कहा था- जार्ज ने बराक मिसाइलें सन 2000 में खरीदी थी। अब 2006 बीतने को है। पर डीआरडीओ त्रिशूल नहीं बना सका। पहले वायु सेना ने डीआरडीओ के चक्कर में दो दशक झक मारी। जब पाकिस्तान की वायु सेना अपन पर हावी हो गई। तो आखिर आकाश की जगह विदेशी टेक्ोलोजी खरीदनी पड़ी। अगर तबके नौ सेनाध्यक्ष ने सही वक्त पर बराक की सिफारिश की। तो कुछ गलत नहीं किया। अब यही बात मौजूदा नौ सेनाध्यक्ष अरुण प्रकाश ने कही। उन ने कहा- 'बराक उम्दा मिसाइल है। नौ सेना को जरुरत थी। त्रिशूल का कब तक इंतजार करते। अब नौ सेनाध्यक्ष के फैसले को राजनीतिक दबाव में बताना। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करना। सेना को हतोत्साहित करेगा। सेना के मोडर्नाईजेशन को रोकेगा।' पर इसी मौके पर मतलब की बात बता दें। त्रिशूल का क्या हुआ। दो दशक का इंतजार। तीन सौ करोड़ रुपए की बर्बादी। और सरकार ने अब कर लिया है त्रिशूल न बनाने का फैसला। अलबत्ता इजरायल के साथ मिलकर अब डीआरडीओ जुटेगा- बराक (एनजी) प्रोजैक्ट में। मौजूदा बराक की रेंज सिर्फ नौ किलोमीटर। बराक (एनजी) की रेंज होगी साठ किलोमीटर। अब बताओ- अगर अबदुल कलाम ने तब त्रिशूल दिखाकर बराक को रोका था। सीबीआई पर भरोसा करें। तो कलाम ने कहा था- 'बराक अप टू दि मार्क नहीं।' पर मौजूदा नौ सेनाध्यक्ष ने कहा है- 'खाने के बाद खाने का स्वाद पता चलता है। बराक के चौदह टेस्ट हुए। बारह में बराक खरी निकली। ठीक निशाना साधा गया। दो निशाने मानवीय गलती से चूके। फिर बराक अप टू दि मार्क कैसे नहीं।' तो लाख टके का सवाल। अगर कलाम ने बराक खरीदने की मुखालफत की। तो कलाम का वह फैसला कैसे सही था। क्या तब बराक खरीदने का जार्ज का फैसला सही नहीं था। अपने रक्षा मंत्री प्रणव से पूछ लीजिए। वह भी कहते हैं- 'बराक खरीदने का फैसला सही था।' पर प्रणव दा तब बच गए थे। अब शायद बचें। वैसे खुद भी रक्षा मंत्री नहीं रहना चाहते। अगर जार्ज जैसा व्यक्ति बेदाग नहीं बचा। तो प्रणव मुखर्जी कैसे बचेंगे। सो वक्त रहते किनारा करना चाहते हैं प्रणव दा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-116115057566936384?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/116115057566936384/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=116115057566936384' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116115057566936384'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116115057566936384'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/10/blog-post_17.html' title='प्रणव दा तो खफा थे, अब नौ सेनाध्यक्ष ने उड़ाई नींद'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-116106381630156754</id><published>2006-10-16T22:40:00.000-07:00</published><updated>2006-10-16T22:43:36.320-07:00</updated><title type='text'>'पोटा' नहीं तो 'वोटा' लगे फारूक पर</title><content type='html'>'अगर आप उसे फांसी पर लटकाना चाहते हैं। तो लटकाइए। पर अफजल की फांसी के बाद के नतीजे समझ लीजिए। देश में आग लग जाएगी। सांप्रदायिक सदभाव खत्म हो जाएगा। आप अफजल को सदियों-सदियों के लिए हीरो बना दोगे। अफजल का अभी कोई महत्व नहीं। पर आप अलगाववादियों को हथियार थमा दोगे। आप मकबूल भट्ट को फांसी की सजा देने वाले का हश्र भूल गए। जज को गोली से उड़ा दिया गया। मैं स्पष्टत: कहना चाहूंगा- उन जजों की हिफाजत करनी होगी।' सोचो, कौन बोल रहा होगा। आपके दिमाग में आएगा- गुलाम नबी आजाद, मुफ्ती मोहम्मद सईद, रशीद अल्वी, एसएआर गिलानी। पर एक नाम आपने नहीं सोचा होगा। वह है- फारूक अबदुल्ला। यह कहा है फारूक अबदुल्ला ने। सीएनएन-आईबीएन पर करण थापर को इंटरव्यू दे रहे थे। सीएनएन-आईबीएन हो। या एनडीटीवी हो। आजकल अफजलवादी ज्यादा दिखाई देते हैं। अफजल को माफी मांगने का पूरा हक। पर ये सब लोग माफी की बात नहीं करते। धमकियां देकर फांसी रुकवाने में लगे हैं। अफजल खुद माफी मांगने को तैयार नहीं। उनके पैरवीकार उसका कसूर मानने को तैयार नहीं। अदालत में खोट निकालकर फांसी रुकवाने में लगे हैं। राष्ट्रपति को इस मुद्दे पर फैसले का हक ही नहीं। राष्ट्रपति सिर्फ दया की भीख पर फैसला कर सकते हैं। अदालत का खोट निकालकर फांसी नहीं रोक सकते। सारी बहस को ही गलत दिशा में चला दिया। अगर अदालत का खोट ही फांसी रुकवाने का हथियार है। तो अफजल की बीवी की याचिका फौरन खारिज होनी चाहिए। पर हो रहा है उल्टा। मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त। मुद्दई माफी मांगने को तैयार नहीं। पैरवीकार फांसी टलवाने में लगे हैं। पूरी कानून व्यवस्था को ऐसी चुनौती पहले कभी नहीं दी गई। अगर अफजल की फांसी रुकी। तो पूरी कानून व्यवस्था चरमरा जाएगी। अपन जनमत चैनल पर बहस सुन रहे थे। संचालक थे- शेखर सुमन। दोनों तरफ अफजल के समर्थक और विरोधी बैठे थे। समर्थकों में एसएआर गिलानी। विरोधियों में संसद में मरने वालों के अनाथ बच्चे। विधवाएं और माएं। साथ में मनिंदरजीत सिंह बिट्टा और विजय गोयल। गिलानी ने बार-बार अदालत पर सवाल उठाए। अदालत पर सवाल उठाकर कैसे कोई दया की भीख मांग सकता है। ये वही हैं एसएआर गिलानी। जो अदालत की वजह से ही सजा से छूट गए। पर अदालत ने निर्दोष नहीं माना। सिर्फ सबूतों का अभाव बताया। सबूतों के अभाव में ही जेसिका लाल के हत्यारे छूट गए। पर सोनिया गांधी ने दुबारा सुनवाई शुरु करवा दी। सोनिया ने गिलानी के मामले में ऐसा नहीं किया। संसद में दस सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। पर एक ईसाई लड़की जेसिका लाल का मामला अलग था। पूरा देश जेसिका लाल के हत्यारे के छूटने से खफा था। खास कर तब। जब हत्यारे का पिता कांग्रेसी नेता हो। सो सोनिया को दो मजबूरियों से कदम उठाना पड़ा। ऐसी मजबूरी एसएआर गिलानी के मामले में नहीं थी। क्योंकि वामपंथी गिलानी के साथ थे। वामपंथी भी नहीं चाहते अफजल को फांसी हो। कांग्रेस भी नहीं चाहती अफजल को फांसी हो। ताकि दाग न लगे। सो गुलाम नबी का जवाब दिग्गी राजा से दिला दिया। यह है- दीवार पर बैठकर तमाशा देखने की प्रवृति। पर बात उस फारूक अबदुल्ला की। जिसने देश को आग में झोंकने की धमकी दी। जिसने आतंकियों को उकसाया। जज को मारने के लिए उकसाया। आतंकियों को याद कराया। जैसे उनने मकबूल को फांसी देने वाले जज नीलकंठ गंजू को गोलियों का निशाना बनाया। वैसे ही अफजल को फांसी की सजा देने वाले को निशाना बनाएं। क्या है फारूक अबदुल्ला का इतिहास। राजीव गांधी जब कांग्रेस के महासचिव थे। तो उनने पत्रकारों को एक फोटो बांटा था। फोटो में फारूक और अमानुल्ला एक मंच पर खड़े थे। दोनों तब जेकेएलएफ में थे। अपन थोड़ा और इतिहास बताएं। जब नेहरू ने शेख अबदुल्ला को गिरफ्तार कर लिया। तो उनके दो बेटे फारूक और तारीक लंदन में थे। फारूक वहां जेकेएलएफ के प्रेस सेक्रेटरी थे। तारीक पाकिस्तानी हाई कमीशन में नौकरी करते थे। बाद में संयुक्त राष्ट्र में पाक प्रतिनिधिमंडल के मेंबर थे। नेहरू ने तारीक की नागरिकता और पासपोर्ट रद्द कर दिए थे। पर बात फारूक की। जो श्रीनगर में भी अमानुल्ला के साथ मंच पर दिखे। अमानुल्ला और मकबूल भट्ट ने बर्किंघम में भारतीय कांसुलर म्हात्रे की हत्या की थी। अमानुल्ला बाद में पाक में ही रहा। जबकि मकबूल बार-बार भारत आता रहा। हत्याएं करता रहा। पकड़ा जाता रहा, जेलों से भागता रहा। आखिर आईबी के दो अफसरों की हत्या करके भाग रहा था। पकड़ा गया। उसी पर मकबूल भट्ट को फांसी हुई। उसी को याद करवा रहे हैं फारूक। और देश को दे रहे हैं धमकी- 'आग लग जाएगी। जज को मार दिया जाएगा।' क्या आतंकवाद के लिए भड़काना गुनाह नहीं। गुनाह है, तो चुप क्यों है सरकार। पोटा ऐसे लोगों के लिए भी था। जिसे मनमोहन ने हटा दिया। अब 'पोटा' के जगह 'वोटा'- वार ऑन टेररिज्म एक्ट- लाने की सोच रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-116106381630156754?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/116106381630156754/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=116106381630156754' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116106381630156754'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116106381630156754'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/10/blog-post_16.html' title='&apos;पोटा&apos; नहीं तो &apos;वोटा&apos; लगे फारूक पर'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-116062977846783243</id><published>2006-10-11T22:03:00.000-07:00</published><updated>2006-10-11T22:09:38.480-07:00</updated><title type='text'>फांसी टाल सकते हैं, रोक नहीं सकते</title><content type='html'>यों तो राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने ठीक नहीं किया। आतंकी के परिवार को मिलना मुनासिब नहीं था। कलाम अगर मोहम्मद अफजल की रहम की अपील पाटिल को न भेजते। तो कोई गुनाह नहीं करते। अलबत्ता आतंकवाद के खिलाफ कड़े रुख का संदेश देते। यों भी मोहम्मद अफजल को न अफसोस। न उसने रहम की अपील की। सो राष्ट्रपति उसे रद्दी की टोकरी में फेंक सकते थे। जरुर कलाम ने गृह मंत्री की सिफारिश पर किया होगा। शिवराज पाटिल से ऐसी सिफारिश की उम्मीद किसको नहीं होगी। राष्ट्रपति ने एक आतंकी को फांसी की सजा से रोककर अच्छा नहीं किया। सोनिया-मनमोहन की सरकार बीस अक्टूबर से पहले सिफारिश करने से रही। आतंकवाद समर्थक मुस्लिम नेताओं का मकसद पूरा हुआ। अब बीस अक्टूबर को तो अफजल को फांसी नहीं होगी। राष्ट्रपति उनके मकसद पूरा होने में ढ़ाल बने। कलाम का अब एक साल भी बाकी नहीं रहा। दुबारा राष्ट्रपति बनने का कलाम का इरादा नहीं। यह उनने काफी पहले कहा था। अब इरादा बदल लिया हो। तो अपन को पता नहीं। अगर इरादा नहीं बदला हो। इरादे और जुबान के पक्के हों। तो जाते-जाते उन ने खुद पर सांप्रदायिकता का लेबल चिपका लिया। पंजाब में जब आतंकवाद शिखर पर था। तो आतंकी हरजिंदर सिंह जिंदा ने पूर्व सेनाध्यक्ष ए.एस. वैद्य को बम से उड़ा दिया था। हरजिंदर सिंह जिंदा को सजा-ए-मौत हुई। रहम की अपील राष्ट्रपति को पहुंची। राष्ट्रपति तब ज्ञानी जैल सिंह थे। तेरह घंटे में रहम की अपील खारिज हो गई। जैल सिंह ने सिखवाद नहीं चलाया। जब मोनिका बेदी ने मनमोहन सिंह से रहम की अपील की। तो मनमोहन सिंह ने भी सिखवाद नहीं चलाया। पर जाने-अनजाने राष्ट्रपति से यह गलती हो गई। वह कुछ तो गुलाम नबी आजाद के चक्कर में आ गए। कुछ अपने शिवराज पाटिल और यूपीए सरकार के चक्कर में। यूपीए सरकार ने आतंकवाद को कभी गंभीरता से नहीं लिया। लिया होता। तो पोटा रद्द न करते। अफजल की साजिश सिरे चढ़ गई होती। आतंकी सुरक्षा घेरा तोड़कर संसद भवन में घुस गए होते। तो अब अफजल की माफी के ज्यादातार पैरवीकार सिधार चुके होते। यों अपन को पहले से पता था। यूपीए सरकार मोहम्मद अफजल को माफी की सिफारिश कर भी दे। तो भी मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा। इंदिरा गांधी के हत्यारे केहर सिंह के मामले में पहले से यह फैसला था। कोर्ट कह चुकी थी- 'राष्ट्रपति-राज्यपालों के सजा माफी के हक की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।' अपन को यह नहीं पता था। ऐसा ही एक मामला में सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। जिसका फैसला बुधवार को हुआ। तो अफजल के पैरवीकारों की टांगें कंपकपाने लगी। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र के गवर्नर के सजा माफी के फैसले पर फैसला दिया। हत्या हुई थी तेलुगुदेशम के वर्कर की। हत्यारा था कांग्रेस का वर्कर। सजा हुई दस साल की। तब तेलुगुदेशम की सरकार थी। अपने चंद्रबाबू सीएम थे। चुनाव हुआ। सरकार बदल गई। तेलुगुदेशम की जगह पर कांग्रेसी सरकार बन गई। चंद्रबाबू की जगह पर वाईएस राजशेखर रेड्डी सीएम बन गए। सुरजीत सिंह बरनाला की जगह सुशील कुमार शिंदे गवर्नर हो गए। हत्यारा कांग्रेसी, सीएम कांग्रेसी, गवर्नर कांग्रेसी। बस हो गया फैसला। धरी रह गई न्याय प्रणाली। अपराधियों का राजनीतिक गठजोड़ सामने आ गया। हत्यारे कांग्रेसी की पत्नी ने मौका ताड़ा। जो मौजूदा एमएलए भी है। जब राजशेखर ने मंत्री नहीं बनाया। तो कम से कम पति की सजा माफी तो कराए। अर्जी लगा दी गई। कांग्रेसी-कांग्रेसी भाई-भाई हो गए। और सजा माफ हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तगड़ी लताड़ लगाई। कहा- 'सांप्रदायिक, जातीय, राजनीतिक आधार पर सजा माफ नहीं हो सकती।' समझदार को इशारा काफी। कोर्ट ने राजनीतिक आधार पर हुई माफी रद्द की। पर लगते हाथों सांप्रदायिक और जातीय आधार भी गिना दिए। ताकि मनमोहन सरकार को भी सनद रहे। राष्ट्रपति एपीजे अबदुल कलाम को भी। अब आंतकियों और उनके समर्थकों का गठजोड़ फांसी टाल तो सकता है। रद्द नहीं करा सकता। पर लिखकर रख लीजिए। गुलाम नबी की चली। तो जब तक यूपीए सरकार रहेगी। फैसला नहीं होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-116062977846783243?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/116062977846783243/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=116062977846783243' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116062977846783243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116062977846783243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/10/blog-post_11.html' title='फांसी टाल सकते हैं, रोक नहीं सकते'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-116002243393400772</id><published>2006-10-04T21:26:00.000-07:00</published><updated>2006-10-04T21:27:13.950-07:00</updated><title type='text'>अब कांग्रेस का हाथ अफजल के साथ</title><content type='html'>गुलाम नबी आजाद का बयान आपने देखा। सिर्फ बयान पर बात रहती। तो इतना बवाल न होता। गुलाम नबी ने अफजल की फांसी माफ करने की चिट्ठी भी लिखी। चिट्ठी में लिखा-'जम्मू कश्मीर में कानून व्यवस्था बिगड़ जाएगी। पाकिस्तान के साथ संबंध भी बिगडेंग़े।' संसद पर हमला हुआ। यानी लोकतंत्र पर हमला हुआ। संसद पर हमला यानी देश पर हमला। अगर अफजल के खुद के बयान पर भरोसा करें। तो आतंकियों का इरादा सेंट्रल हॉल तक जाने का था। प्रधानमंत्री की हत्या करने का था। रास्ते में जो भी आता। उसे खत्म करने के इरादे से आए थे आतंकी। पर अपने वॉच एंड वार्ड ने आतंकियों के मंसूबे नाकाम किए। जान पर खेलकर मंसूबे नाकाम किए। दस सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान दे दी। पर आतंकियों को अंदर घुसने नहीं दिया। अपने राजस्थान के जगदीश प्रसाद यादव भी थे। अब अपन अगर अफजल को फांसी की सजा माफ कर दें। तो जगदीश प्रसाद यादव को अच्छी श्रद्धांजलि होगी। अपन अपने शहीदों को कैसी श्रद्धांजलि देना चाहते हैं। यह अपने कर्णधारों को तय करना होगा। गुलाम नबी उस समय सांसद थे। अगर आतंकी कामयाब होते। बीच में जगदीश यादव न आते। तो गुलाम नबी भी नहीं बचते। अपन उस समय संसद भवन के अंदर थे। अपन ने गोलियों की आवाज सुनी। तो दौड़ कर बाहर निकले। कोहराम मचा था। आतंकियों को अपन ने सामने से देखा। सुरक्षाकर्मी आतंकियों की गोलियों के बीच दरवाजे बंद करवा रहे थे। अपन बाहर तो निकल आए। पर अंदर घुसना मुश्किल हो गया। संसद भवन की दीवारों के साथ दौड़ते रहे। शायद कोई दरवाजा खुला मिले। एक दरवाजा बंद ही होने वाला था। अलबता हो ही गया था। बाहर खड़े सुरक्षाकर्मी ने अपन को दौड़ते देखा। तो दरवाजा अंदर से बंद करने वाले सुरक्षाकर्मी को गुहार लगाई। दरवाजा फिर खुला और अपन अंदर घुसे। अंदर न घुस पाते। तो आज आप यह कॉलम न भी पढ़ पाते। बाहर तो जितने रह गए थे। उनमें ज्यादातर शहीद हुए। और अब गुलाम नबी कहते हैं-'हत्यारों को माफ कर दो।' वजह बताते हैं-'कश्मीर में अमन बिगड़ जाएगा। पाक से रिश्ते खराब होंगे।' कांग्रेस ने पलट कर गुलाम नबी को नहीं कहा-'कानून व्यवस्था नहीं संभाल सकते तो इस्तीफा दो।' कांग्रेस ने नहीं कहा-'विदेशों से रिश्ते तय करना सीएम का काम नहीं।' कांग्रेस ने विरोध नहीं किया। प्रवक्ता सोनिया गांधी की तरफ से बोले-'कांग्रेस न गुलाम नबी के स्टैंड का समर्थन करती है न विरोध।' कांग्रेस की चुप्पी गुलाम नबी को मौन समर्थन थी। पर जम्मू कश्मीर के हिंदू कांग्रेसियों की जमीन खिसक गई। दो दिन तो मंगतराम शर्मा हाईकमान के रूख का इंतजार करते रहे। पर हाईकमान ने गुलाम नबी को घुड़की नहीं पिलाई। तो खुद खुलकर सामने आए। उनने गुलाम नबी आजाद के स्टैंड का विरोध किया। कहा-'आतंकवादियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। संसद पर हमला, देश पर हमला था।' कांग्रेस ने फिर वही रूख अपनाया। तो कांग्रेस का दोहरा चेहरा सामने आया। हिंदुओं को खुश करने के लिए मंगतराम। मुसलमानों को खुश करने के लिए गुलाम नबी। चित भी मेरी पट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का। हिंदुस्तान के सब मुस्लिम नेताओं का चेहरा बेनकाब होने लगा। सिर्फ गुलाम नबी आजाद क्यों। नए नए कांग्रेसी रशीद अल्वी का बयान देखिए। जनमत टीवी पर बहस में हिस्सा ले रहे थे। बोले-'जिसे आप आतंकवादी कहते हैं। उसे जम्मू कश्मीर में स्वतंत्रता सेनानी कह रहे हैं।' आपको परवेज मुशर्रफ और रशीद अल्वी में कोई फर्क दिखा। यही बात मुशर्रफ ने आगरा में कही थी। तो वाजपेयी ने बातचीत तोड़ दी थी। मुशर्रफ को बैरंग लौटा दिया था। तब तब बातचीत नहीं की। जब तक मुशर्रफ ने यह नहीं कहा-'पाक और पीओके से आतंकवादियों को भारत के खिलाफ षडयंत्र नहीं रचने देंगे। टे्रनिंग कैंप नहीं चलने देंगे।' भारत में एक क्लास पैदा हो चुकी। जो कश्मीर में आतंकियों को स्वतंत्रता सेनानी कहना शुरू हो चुकी। आप गुलाम नबी का बयान देख लें। रशीद अल्वी का बयान देख लें। इन दोनों कांग्रेसियों के अलावा पूर्व कांग्रेसी मुफ्ती मोहम्मद सईद का बयान देख लें। फारूख अबदुल्ला या उमर अबदुल्ला का बयान देख लें। हुर्रियत कांफ्रेंस तो सड़कों पर उतर ही चुकी। पीडीपी-नेंका में होड़ लग चुकी। पीडीपी चाहती हैं-'सेल्फ रूल।' नेंका चाहती हैं-'1953 से पहले की स्थिति।' कांग्रेस दोनों में संतुलन बना रही हैं। इसका असर दिखने लगा। गुलाम नबी ने अफजल की पत्नी को दिल्ली भेजा। राष्ट्रपति तक गुहार पहुंचाई। कुछ घंटों में याचिका राष्ट्रपति भवन से कूच कर गई। गृह मंत्रालय तक भिजवाने का बंदोबस्त हुआ। गृह मंत्रालय से भी घंटे भर में सूचना दिल्ली सरकार को पहुंच गई। तिहाड़ जेल भी पहुंच गई। इसे कहते है-'कांग्रेस का हाथ अफजल के साथ।' ऐसा न होता। तो ऐसी तेजी भी न होती।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-116002243393400772?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/116002243393400772/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=116002243393400772' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116002243393400772'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/116002243393400772'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/10/blog-post_04.html' title='अब कांग्रेस का हाथ अफजल के साथ'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115994169282246410</id><published>2006-10-03T22:59:00.000-07:00</published><updated>2006-10-03T23:01:32.840-07:00</updated><title type='text'>डेंगू के डंक से थर्राया देश, अंबूमणि बेफिक्र</title><content type='html'>सिर्फ उतर भारत ही नहीं। पश्चिम भारत भी डेंगू की चपेट में आ गया। दिल्ली के चारों तरफ डेंगू-डेंगू हो गया। देश का सबसे बड़ा अस्पताल है- एम्स। एम्स के चारों तरफ डेंगू फैल गया। इलाज करने वाले डाक्टर खुद सिधार गए। फिर भी अपनी शीला दीक्षित सरकार को यह महामारी नहीं लगी। अपने उपराज्पाल बनवारी लाल जोशी के साथ मीटिंग हुई। तो चर्चा हुई- महामारी घोषित किया जाए। या न किया जाए। फैसला हुआ- 'घबराने की कोई बात नहीं। अभी इतने लोग भी नहीं मरे। जो महामारी घोषित किया जाए।' दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री हैं अपने योगानंद शास्त्री। मीटिंग से निकलते हुए बोले- 'अभी महामारी घोषित करने की जरुरत नहीं।' यानी पैमाना तय हो गया। एक मापदंड तय कर लिया गया। इतने लोग मरेंगे। तो महामारी घोषित होगी। तादाद कितनी तय हुई। यह अपन को पता नहीं चला। पर अगर दिल्ली वालों को महामारी घोषित करवाना हो। तो मरने वालों की तादाद बढ़ानी पड़ेगी। वैसे एम्स उसमें कोई कमी नहीं छोड़ रहा। मंगलवार को एक दिलचस्प किस्सा सामने आया। एक मरीज ने अपनी जांच रपट दिखाई। रपट में उसकी बीमारी को डेंगू घोषित किया था। रिपोर्ट सोमवार की थी। पर न तो उसे अस्पताल में भर्ती किया। न इलाज शुरु किया। मंगलवार को वह एम्स के सामने भटक रहा था। डेंगू का शोर मचा। तो विजुअल मीडिया की टीमें एम्स अस्पताल पहुंची। डेंगू का वार्ड तो अलग बना था। पर न वहां डाक्टर था, न नर्स। जब डेंगू से डाक्टर भी मर रहे हों। तो इलाज करने कौन आएगा। पता है- एम्स में डाक्टरी पढ़ रहा एक छात्र राजकिरण डेंगू से मर गया। सुनते हैं मंगलवार को एम्स के हास्टल भी खाली होने लगे। जैसे ही एक डाक्टर के मरने की खबर फैली। डाक्टरों के फैमिली वालों में हड़कंप मच गया। फोन घनघनाने लगे। महिला डाक्टरों के पतियों के। पुरुष डाक्टरों की पत्नियों के। कुंवारों के मां-बाप ने अपने डाक्टर पुत्रों को सलाह दी- जान है, तो जहान है। हॉस्टल छोड़ो घर लौट आओ। एक तरफ तो डाक्टरों में दहशत। दूसरी तरफ अपने अंबूमणि रामदौस बेफिक्र। अंबूमणि कितने एक्टिव थे। जब डाक्टर वेणुगोपाल को हटाने की मुहिम छेड़ी थी। कैसे जल्दबाजी में बोर्ड की मीटिंग बुलाई थी। पर अब जब डेंगू फैला। तो अपने अंबूमणि ने एम्स की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है- दस अक्टूबर को। मीटिंग आठ दिन बाद। फिर भी उसे लिखा गया इमरजेंसी मीटिंग। पर जब मंगलवार को अंबूमणि पर हमले शुरु हुए। एम्स के एक डाक्टर अनिल शर्मा ने कहा- 'जो मंत्री डीजी को हटाने के लिए सरगर्मी दिखा रहे थे। वह डेंगू के मुद्दे पर सरगर्मी क्यों नहीं दिखा रहे।' जब आलोचना शुरु हुई। तो अपने अंबूमणि की नींद खुली। उन ने प्रभावित राज्यों की पांच अक्टूबर को मीटिंग बुला ली। पर हाथोंहाथ बयान भी दिया- 'घबराने की कोई बात नहीं। महामारी नहीं फैली। मैं दिल्ली, हरियाणा, यूपी और राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्रियों की मीटिंग बुला रहा हूं। ताकि डेंगू को रोकने पर विचार हो।' तो अपने अंबूमणि ने मान लिया। भले ही महामारी घोषित नहीं की। पर कम से कम पांच राज्यों में महामारी का खतरा पैदा हो गया। वैसे महामारी घोषित करने से क्या होता। महामारी घोषित हो जाए। तो केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बनेगी। वैसे महामारी जैसे हालात तो पैदा हो गए। पर केंद्र सरकार जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। सो फार्मूला यह निकला- 'अभी कुछ और लोग मरने दो।' यों दिल्ली से खबर यह थी- एम्स में मंगलवार को एक हजार लोग पहुंचे। पर अपने अंबूमणि बोले- 'पूरे देश में डेंगू के अब तक सिर्फ 497 मामले सामने आए।' अंबूमणि लाख कोशिश कर भी वेणुगोपाल को नहीं हटा पाए। वह टीस अभी भी मन से निकली नहीं। मंगलवार को भी जब एम्स का जिक्र आया। तो मुंह बिचका लिया। कहा- 'एम्स में जो कुछ हुआ। वह दुर्भाग्यपूर्ण। पर अपसोस, किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। मैंने प्रशासन से कहा है- जिम्मेदारी तय की जाए। जो भी जिम्मेदार हो, उसे सजा मिले।' आप देख लेना अपने अंबूमणि इसका ठीकरा भी वेणुगोपाल के सिर फोड़ेंगे। लाशों पर राजनीति और किसे कहेंगे। कांग्रेस के साथ रहकर अंबूमणि काफी कुछ सीख गए। पर बात सिर्फ दिल्ली की नहीं। राजस्थान में भी डेंगू का कहर बरप गया। महाराष्ट्र का पुणे भी नहीं बचा। पंजाब के जालंधर-लुधियाना से भी खबरें आ गई। अगर डेंगू को महामारी घोषित न किया। तो न जाने कितनी जानें जाएंगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115994169282246410?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115994169282246410/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115994169282246410' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115994169282246410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115994169282246410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/10/blog-post_03.html' title='डेंगू के डंक से थर्राया देश, अंबूमणि बेफिक्र'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115985247684164171</id><published>2006-10-02T22:12:00.000-07:00</published><updated>2006-10-02T22:14:36.860-07:00</updated><title type='text'>गांधीगिरी हो गया, तो मनमोहनगिरी भी हो जाए</title><content type='html'>वैसे तो वी.वी. गिरी राष्ट्रपति हुए। पर उनकी किसी ने दादागिरी से तुलना नहीं की। अब जब महात्मा गांधी के लिए गांधीगिरी हो गया। किसी ने चूं तक नहीं की। तो आज गांधीगिरी हुआ। कल गांधीगर्दी भी होगा। जब दादागिरी से गांधीगिरी बन गया। तो गुंडागर्दी से गांधीगर्दी क्यों नहीं। यों अपन को शबदों के इस खेल से कोई एतराज नहीं। अपन ने राजनीतिबाज और चंडूखाना जमकर लिखा। तो अपन को गांधीगिरी पर एतराज क्यों। कल कोई गांधीगर्दी करेगा। तो भी अपन को एतराज नहीं होगा। पर 'लगे रहे मुन्नाभाई' इस वक्त ही क्यों आई। जब 1993 के बम धमाकों का फैसला शुरु हो चुका। संजय दत्त का फैसला भी जल्द होगा। जो एके 47 राईफल का दीवाना हो। वह गांधीगिरी कैसे करेगा। यह अपने पल्ले नहीं पड़ता। गांधी जयंती पर संजय दत्त मुंबई में शांति मार्च पर निकले। तो अपन को वह कहावत याद आ गई। मुंह में राम-राम, बगल में एके-47 राइफल। मुंबई बम धमाकों से ठीक पहले। कहीं यह संजय दत्त की छवि दुरुस्त करने की चाल तो नहीं। अगर ऐसा न होता। तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी में फिल्म की चर्चा क्यों होती। बीजेपी की वर्किंग कमेटी में चर्चा होती। तो बात समझ में आती भी। आखिर बीजेपी के दोनों शीर्ष पुरुष अटल-आडवाणी फिल्मों के दीवाने रहे। फिल्मों के इतने दीवाने। कभी इकट्ठे जाया करते थे फि ल्म देखने। आडवाणी के पास होता था लंबरेटा स्कूटर। पीछे बैठते थे अटल बिहारी। जिनने दिल्ली का पहाड़गंज इलाका देखा हो। उन्हें पता होगा। बारिश के दिनों में कैसे होती है कीचड़गिरी। पहाड़गंज में एक खन्ना सिनेमा हॉल होता था। वहां पिक्चर देखने जा रहे थे। कीचड़गिरी ने स्कूटर फिसला दिया। दोनों धडाम से गिरे। दोनों की धोतियां कीचड़ में सन गई। सो वापस आना पड़ा। अपन को नहीं पता था। मोहसिना किदवई भी फिल्मों की इतनी शौकीन होंगी। उन ने सारी वर्किंग कमेटी को 'लगे रहो मुन्नाभाई' का दीवाना बना दिया। कांग्रेस दफ्तर से सिनेमा हॉलों के फोन घनघनाने लगे। सिनेमा हॉल के मालिक पास लेकर चौबीस अकबर रोड को दौड़े। पर कुछ थे, जो फिल्म के शौकीन नहीं थे। सो फिल्म के पास मुफ्तखोरों के हाथ लगे। पर सबका दिमाग मोहसिना किदवई जैसा नहीं। भोपाल के कांग्रेसियों को गांधीगिरी नहीं जंची। वे ठहरे सच्चे कांग्रेसी। उन्हें गांधीगिरी शबद गांधी का अपमान लगा। सो उनने ऐसा प्रदर्शन किया। गांधी को धो डाला। पर असली गांधीगिरी तो इस बार अपने गुलाम नबी आजाद ने दिखाई। इसे अपन गुलामगिरी तो नहीं कह सकते। उन ने संसद के हमलावर मोहम्मद अफजल को माफ करने की गुहार लगाई। तो सबको गांधीगिरी याद आ गई। पता नहीं गांधी ने कभी कहा था, या नहीं। पर अपन बचपन से सुनते आए। कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे। तो दूसरा गाल आगे कर दीजिए। गुलाम नबी आजाद ने आतंकियों के सामने कुछ ऐसा ही किया। उन ने अपने दोनों ही गाल आतंकियों के आगे कर दिए। धन्य हो वोट की राजनीति। वोट की राजनीति अपन ने इस बार नैनीताल में देखी। जब सोनिया गांधी ने कहा- 'आतंकवाद की वारदात के लिए मुसलमानों को शक की निगाह से न देखा जाए।' सोनिया ने देश को नया मंत्र दिया। यह अलग बात। जो आतंकवाद की हर वारदात में मुस्लिमों का हाथ निकल रहा। बहुत कोशिश हुई। कम से कम मालेगांव में हिंदुओं का हाथ निकल आए। वह भी नहीं निकला। जुलाई में जो बम धमाके हुए। उसका भी खुलासा हो गया। ग्यारह पाकिस्तानी थे। सात भारतीय। सातों भारतीय मुस्लिम। सोनिया के बयान पर एक कांग्रेसी सांसद बेहद खफा थी। उन ने अपन से कहा- 'जब देश के मुसलमान पाकिस्तानी आतंकियों को पनाह दे रहे हों। तो भारतीय मुसलमानों को शक की निगाह से क्यों न देखें।' कांग्रेसी सांसद कुछ ज्यादा भड़की हुई थी। वैसे आजकल ऐसे कांग्रेसी ढूंढ़ना आसान नहीं। जो सोनिया के किसी बयान में खोट निकाले। अपन इसे मुस्लिम परस्ती की सोनियागिरी कहें। या न कहें। समझ नहीं आ रहा। पर प्रधानमंत्री के मुंह से हू-ब-हू वही बात सुनी। तो अपन को मुस्लिम परस्ती की मनमोहनगिरी कहने पर परहेज नहीं। पोटा भी इसलिए हटाया। क्योंकि पोटा में धरे जा रहे थे मुस्लिम। अब देश के मुस्लिम आतंकियों को पनाह देंगे। तो पोटा लगेगा ही। पर पोटा हटाकर भी मनमोहन को चैन नहीं आया। तो खुल्लमखुल्ला कहने लगे- 'मुसलमानों की धर-पकड़ न की जाए।' इस पर हताश उस कांग्रेसी महिला सांसद ने अपन से कहा- 'तो क्या हिंदुओं की धर-पकड़ की जाए।' अपन ने इस कांग्रेसी सांसद को सुझाव दिया। यह सुझाव हर भारतीय को समझना होगा। गांधी-नेहरू के समय कांग्रेस में दो धाराएं थीं। वामपंथी और हिंदुत्ववादी। दोनों कांग्रेस में प्रेशर ग्रुप थे। अब भी दो प्रेशर ग्रुप हैं। वामपंथी और मुस्लिमपरस्त। कांग्रेस के हिंदू नेता दब गए। वीएन गाडगिल आखिरी नेता थे। वसंत साठे अलग-थलग पड़ गए। गांधीगिरी ने देश का बंटवारा करवा दिया। अब मनमोहनगिरी और गुलामनबीगिरी क्या-क्या करवाएगी। देखते जाइए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115985247684164171?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115985247684164171/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115985247684164171' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115985247684164171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115985247684164171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/10/blog-post.html' title='गांधीगिरी हो गया, तो मनमोहनगिरी भी हो जाए'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115942046501587036</id><published>2006-09-27T22:13:00.000-07:00</published><updated>2006-09-27T22:14:25.026-07:00</updated><title type='text'>स्टिंग आपरेशनों पर दोहरे मापदंड अपनाती कांग्रेस</title><content type='html'>तहलका डॉट काम ने पहला स्टिंग आपरेशन किया। तो वह तहलका के नाम से ही मशहूर हो गया। अब जब भी तहलका का नाम जुबान पर आए। जार्ज फर्नांडिस याद आ जाएंगे। जस्टिस वेंकटस्वामी ने जांच शुरु की। जिस-जिस के खिलाफ सबूत मिले। सम्मन जारी हुए, तलब किया गया। जार्ज के खिलाफ ना सम्मन हुए, न बुलाया गया। अंतरिम रपट में भी जार्ज का जिक्र नहीं था। वाजपेयी ने जार्ज को दुबारा मंत्री बना दिया। तो तीन साल तक कांग्रेस ने जार्ज का संसद में बायकाट किया। कांग्रेस सत्ता में आई। तो प्रणव मुखर्जी का संसद में बयान हुआ। बयान में जार्ज को बेकसूर बताया गया। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा भी हुआ। इस पर कांग्रेस में बवाल मचा। प्रणव की कुर्सी खतरे में पड़ गई। तो आनन-फानन में फैसला पलटा। जार्ज के खिलाफ सीबीआई केस दर्ज हुए। अब कुछ और स्टिंग आपरेशनों की बात। छत्तीसगढ़ चुनाव के समय दिलीप सिंह जूदेव के खिलाफ। अजीत जोगी ने करवाया था यह स्टिंग आपरेशन। यह अपन नहीं कह रहे। इस पर अदालती फैसला हो चुका। अदालत ने यह कहा। फिर हुआ आपरेशन दुर्योधन। अनिरुध्द बहल पहले तहलका में थे। तहलका दो-फाड़ हुआ। तो अनिरुध्द बहल ने कोबरा पोस्ट बनाया। बहल ने स्टिंग आपरेशन कर 'आजतक' को पचास लाख में बेचा। आपरेशन था - सांसदों के सवाल के बदले पैसा लेने का। ग्यारह सांसद आनन-फानन में बर्खास्त हो गए। एक और आपरेशन हुआ- सांसद निधि खर्च करने के बदले रिश्वत लेने का। और अब जेसिकालाल हत्याकांड के गवाहों को खरीदने का। तहलका डॉट काम की हरेंद्र बवेजा का स्टिंग आपरेशन। पिछले दिनों मनु शर्मा बरी हुए। तो गवाहों के बिकने पर बवाल मचा। जेसिकालाल एक ईसाई मॉडल बार गर्ल थी। सोनिया गांधी ने सीरआरपीसी बदलने का सुझाव दे दिया। ताकि गवाह आसानी से मुकर न सके। खलबली मची। तो दुबारा से ट्रायल शुरु हुआ। और उधर हरेंद्र बवेजा ने शुरु किया स्टिंग आपरेशन। हत्याकांड के तीन गवाह थे। शायन मुंशी, कर्ण राजपूत, शिव दास। तीनों मुकर गए थे। शायन मुंशी कितने में बिका। पता नहीं। उसने अदालत में कहा था- 'मैं हिंदी नहीं जानता। इसलिए पता नहीं गवाही के समय क्या लिखा था।' पर स्टिंग आपरेशन में निकला कुछ और। एक हिंदी फिल्म की ऑफर की गई। पूछा गया- हिंदी बोलने में दिक्कत तो नहीं आएगी। शायन मुंशी ने कहा- 'मैंने कोलकाता के डॉन बास्को स्कूल में हिंदी पढ़ी है। कोई दिक्कत नहीं होगी।' दूसरा गवाह कर्ण राजपूत बीमारी से मर चुका। उसके भतीजे ने खुलासा किया- 'अदालत में मुकरने के लिए पच्चीस लाख रुपए दिए गए थे।' तीसरा गवाह शिव दास। वह बीना रमानी के रेस्टोरेंट में इलेक्ट्रिशियन था। तनख्वाह थी तीन हजार रुपया। अब उसका अपना फ्लैट है। पटेलनगर में अपना जनरल स्टोर। अब कुछ बात विनोद शर्मा के बारे में। जब मनु शर्मा ने जेसिकालाल की हत्या की। तो विनोद शर्मा चंडीगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष थे। शुरुआती ना-नुकुर के बाद सोनिया ने इस्तीफा मांग लिया। फिर लोकसभा का टिकट भी नहीं दिया। पर विनोद शर्मा इतने जुगाड़ू निकले। इस बार हरियाणा विधानसभा का टिकट पा लिया। कितने में पाया, किस-किस को खिलाया। कौन जाने। टिकट मिला तो चुनाव भी जीत लिया। सीएम हुड्डा के इतने करीब हो गए। मंत्री भी बन गए। हुड्डा ने लोकसभा का इस्तीफा दिया। तो बेटे दीपेंद्र हुड्डा को टिकट मिला। दीपेंद्र के चुनाव प्रभारी विनोद और मनु ही थे। विनोद शर्मा पिछले चालीस सालों में कखपति से लखपति। अब लखपति से अरबपति कैसे हुए। ये किस्सा भी सुनाते जाएं। विनोद शर्मा के पिता यानी मनु शर्मा के दादा थे केदारनाथ शर्मा। चंडीगढ़ के पास एक जगह है बनूड़। केदारनाथ की वहां किराना की दूकान थी। पंजाब के एक कांग्रेसी नेता हुआ करते थे हंसराज शर्मा। उसी के माध्यम से केदारनाथ कांग्रेस में आ गए। बस फिर क्या था। शराब के ठेके लेने लगे। पंजाब से लेकर हरियाणा तक। चंडीगढ़ से लेकर हिमाचल तक। शराब के ठेकों पर छा गए। सत्ता का आशीर्वाद था। शराब की डिस्टिलरी लगने लगी। एक नहीं, चार-चार। एक से एक आलीशान होटल बनने लगे। दो सूगर मिलें भी बना ली। दबदबा इतना था। राज्यसभा के मेंबर हुए। तो केंद्र में मंत्री भी हो गए। पहली बार सांसद बने। पर कोठी मिली दो एकड़ की। वही, जिसमें अब राहुल गांधी रहते हैं। पर बात विनोद शर्मा के ताजा रसूख की। जो स्टिंग आपरेशन में गवाहों को खरीदते पाए गए। स्टिंग आपरेशन से कांग्रेस की चूलें हिल गई। जिस कांग्रेस ने टीवी पर देखते ही दस सांसदों को बर्खास्त करवा दिया। उसी कांग्रेस के प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी बोले- 'स्टिंग आपरेशन के टेप का अभी सत्यापन नहीं हुआ।' न तहलका के टेप का सत्यापन हुआ था। जब जार्ज से इस्तीफा मांग लिया था। न आपरेशन दुर्योधन के टेप का सत्यापन हुआ। और सांसदों को बर्खास्त कर दिया। स्टिंग आपरेशन पर दोहरे मापदंड का सबूत देखिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115942046501587036?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115942046501587036/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115942046501587036' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115942046501587036'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115942046501587036'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/09/blog-post_27.html' title='स्टिंग आपरेशनों पर दोहरे मापदंड अपनाती कांग्रेस'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115890040142013539</id><published>2006-09-21T21:43:00.000-07:00</published><updated>2006-09-21T21:46:41.443-07:00</updated><title type='text'>थाईलैंड में तख्ता पलट पर चुप्पी खतरनाक</title><content type='html'>लोकतांत्रिक देश ऐसा नहीं करते। जैसा भारत ने किया। थाईलैंड में सेना ने तख्ता पलट दिया। अपने विदेश मंत्रालय ने टिप्पणी से इनकार किया। निंदा से इनकार किया। किसी भी देश में लोकतंत्र को ऐसे कुचला जाए। तो अपन को मुखालफत करनी चाहिए। पर अपने विदेश मंत्रालय ने मुखालफत नहीं की। इसकी वजह अपन को ढूंढ़नी पड़ेगी। अगर मनमोहन सरकार न होती। अगर वाजपेयी सरकार होती। तो क्या थाईलैंड में हुए तख्ता पलट की आलोचना करती। अपन को नवजोत सिंह सिध्दू का वह डायलॉग याद आ गया। अगर मेरी चाची मर्द होती। तो मैं उसे चाचा कहता। यह डायलॉग यहां भी लागू होगा। अब वाजपेयी सरकार है नहीं। सो होती तो क्या करती। इस पर बहस फिजूल। बीजेपी ने तीसरे दिन भी कोई रिएक्शन नहीं दिया। जसवंत सिंह या यशवंत सिन्हा भी नहीं बोले। अटल बिहारी वाजपेयी का भी कोई बयान नहीं आया। कांग्रेस के प्रवक्ता भी चुप ही रहे। मामला विदेश का हो। तो अपन पीएम से रिएक्शन की उम्मीद नहीं करते। वैसे जब डेनमार्क में पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ कार्टून छपा। तो मनमोहन सिंह ने रिएक्शन में देरी नहीं की। हालांकि इसकी जरुरत नहीं थी। यह डेनमार्क का अंदरुनी मामला था। भारत कोई मुस्लिम देश भी नहीं। जो उसका पीएम विरोध जताता। पर सवाल डेनिश कार्टून के याद करने का क्यों पैदा हुआ। यह अपन थाईलैंड के संदर्भ में बताएंगे। पहले बात विदेश मंत्रालय की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने सैन्य तख्ता पलट के खिलाफ नैतिक स्टैंड नहीं लिया। तो इसकी वजह जरुर होगी। अपन इसकी वजह पीएम के उस बयान में ढूंढेंगे। जो उन ने आतंकवाद पर बुलाई मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में दिया। उन ने कहा- 'आतंकवाद के पीछे मुस्लिम हाथ देखना ठीक नहीं।' पर मनमोहन ने मालेगांव की वारदात में हिंदू हाथ से इनकार नहीं किया। उन ने जांच रपट पर भरोसा नहीं किया। प्रकाश कारत की हां में हां मिलाई। यह घोर अल्पसंख्यकवाद था। अपन यह तो नहीं मान सकते। पीएम को मालेगांव की जांच रपट का पता नहीं था। मालेगांव के बमों की फोरेंसिक रपट आ गई थी। रपट में आरडीएक्स की बात साफ कही गई थी। आरडीएक्स किसी हिंदू संगठन के पास तो हो नहीं सकता। पर अब तो मालेगांव की जांच और आगे बढ़ गई। लश्कर-ए-तोईबा और सिमी से तार जुड़ चुके। पर पीएम का कोई बयान नहीं आया। पीएम की बात छोड़िए। महाराष्ट्र के सीएम का बयान भी नहीं आया। ऐसा घोर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण लोकतंत्र के हित में नहीं। अब पीएम वाला बयान सोनिया ने भी दोहराया। उन ने बरेली में कहा- 'आतंकवाद की हर वारदात में मुस्लिम हाथ देखना ठीक नहीं।' इराक में सद्दाम हुसैन के खिलाफ कार्रवाई हो। तो अपन चुप नहीं रहते। पर वैसी ही लोकतंत्र विरोधी हरकत थाईलैंड में हो। तो अपन चुप्पी साध लेते है। ऐसा क्यों। आपके मन में भी सवाल उठ रहा होगा। भारत ने सैन्य तख्ता पलट की मुखालफत क्यों नहीं की। तो अपन बताएं। थाईलैंड में कई महीनों से मुस्लिम आतंकवाद शुरु हो चुका। पीएम थाकसिन शिनावाता मुस्लिम बागियों को कुचल रहे थे। यह विवाद बौध्द-मुस्लिम का न बने। इसीलिए थाकसिन ने सोंधी बूनयारातकलिन को सेनाध्यक्ष बनाया। बूनयारातकलिन मुस्लिम हैं। थाकसिन ने सोचा- 'बून यारातकलिन का मुस्लिम होना काम आएगा। दक्षिण थाईलैंड में दो साल से चल रहे मुस्लिम विद्रोह से निपटने में मदद मिलेगी।' पर सेनाध्यक्ष बनते ही बून यारातकलिन के तेवर बदल गए। उन ने वैसे ही मुस्लिम बागियों से बातचीत की पैरवी की। जैसे आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने नक्सलियों से बातचीत की पैरवी की थी। वैसे थाईलैंड के मुसलमानों को बागी कहना ठीक नहीं। आतंकी कहना ज्यादा उचित होगा। इसकी वजह भी अपन बता दें। थाईलैंड के बागी मुसलमानों के रिश्ते अफगानिस्तान के जेहादियों से हैं। उनके रिश्ते पाकिस्तान के जेहादियों से हैं। उनके रिश्ते बांग्लादेश के हरकत-ऊल-जिहाद-अल-इस्लामी से हैं। उनके रिश्ते जमाए-ऊल-मुजाहिद्दीन से हैं। जुलाई में पाकिस्तान के डेली टाईम्स में एक लेख छपा। जिसमें कहा गया- 'थाईलैंड के बागियों का कंट्रोल और कमांड मुल्तान में है।' पहले भी थाईलैंड में मुस्लिम मल्य विद्रोह हुआ। पर अब विद्रोहियों के तार जेहादियों से जुड़ चुके। आतंकवाद के विश्लेषक बी. रमण लिखते हैं- 'करीब एक हजार थाई मुस्लिम बांग्लादेश और पाकिस्तानी मदरसों में पढ़ रहे हैं। ऐसे मदरसों में जिसका कंट्रोल लश्कर-ए-तोईबा कर रहा है।' फिर भी भारत ने थाईलैंड के सैन्य तख्ता पलट का विरोध नहीं किया। तो इसे क्या कहिएगा। पहले हवाना में पाक को आतंकवाद का शिकार कहना। भारत में बार-बार कट्टरपंथी जेहादियों का बचाव करना। अब थाईलैंड के सैन्य तख्ता पलट पर चुप्पी साधना। सब अल्पसंख्यकवाद के तुष्टिकरण के सबूत। पर लाख टके का सवाल दूसरा। जब थाईलैंड में चुनाव होने ही वाले थे। तो तख्ता पलट क्यों। इसकी वजह भी बता दें। थाकसिन को चुनाव में अपार समर्थन मिलेगा। अगर थाकसिन चुनाव लड़े। अगर सैन्य शासक ने थाकसिन को चुनाव लड़ने की इजाजत दी। तो थाकसिन को जीतने से कोई नहीं रोक सकता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115890040142013539?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115890040142013539/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115890040142013539' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115890040142013539'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115890040142013539'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/09/blog-post_21.html' title='थाईलैंड में तख्ता पलट पर चुप्पी खतरनाक'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115872891862972153</id><published>2006-09-19T22:07:00.000-07:00</published><updated>2006-09-19T22:08:38.653-07:00</updated><title type='text'>साझा मेकेनिज्म अब तक का सबसे बड़ा कूटनीतिक झटका</title><content type='html'>पता नहीं मनमोहन कितना समझा पाएंगे। पर फिलहाल उनकी दलीलें गले नहीं उतर रही। आईबी के एक डायरेक्टर थे अजीत डोवल। उन ने इसे भारत के लिए रणनीतिक झटका कहा। मनमोहन-मशर्रफ साझा बयान की चीर-फाड़ अभी और होगी। सोमवार की रात वाजपेयी के घर मीटिंग हुई। मीटिंग में राजनाथ, आडवाणी, जसवंत, यशवंत, शौरी थे। छह नेताओं की मीटिंग। छह पेज का बयान। अपन ने सवा दो साल में इतना कड़ा बयान नहीं देखा। जितना मीटिंग के बाद मंगलवार को जारी हुआ। भले ही बयान में अमेरिका का नाम नहीं लिखा। पर उस अदृश्य शक्ति का जिक्र जरुर किया। जिसके दबाव में यह साझा बयान हुआ। हर किसी को शक है। मनमोहन सिंह सोमवार को लौट रहे थे। तो रास्ते में पत्रकारों ने भी यही सवाल किया। मनमोहन सिंह ने वही जवाब दिया। जो देना था। बोले- 'किसी का दबाव नहीं था।' नहीं होगा, अमेरिका का दबाव। पर मनमोहन वामपंथियों के दबाव से कैसे इनकार करेंगे। मुंबई में बम धमाके हुए। तो मनमोहन ने सचिव स्तरीय बातचीत रोक दी। वामपंथियों ने इस फैसले की मुखालफत की। अब जब मनमोहन हवाना जा रहे थे। तो वामपंथियों से सलाह की। वामपंथियों ने साफ कहा- 'शांति वार्ता को आतंकवाद से मत जोड़ो।' मनमोहन ने वही किया। जो वामपंथी चाहते थे। मुशर्रफ भी बरसों से यही चाहते थे। आतंकवाद भी चलता रहे। शांति वार्ता भी चलती रहे। संसद पर हमले के बाद वाजपेयी ने शांति वार्ता ठप्प की। तो छह जनवरी 2004 को उसके नतीजे निकले। मुशर्रफ ने जिन आतंकवादियों को आगरा में स्वतंत्रता सेनानी कहा था। उन्हें पाक की जमीन से आतंकवाद फैलाने की इजाजत नहीं देने की बात कही। पर बात अजीत डोवल की। वह जो बात कहेंगे। उसकी अपन अनदेखी नहीं कर सकते। अजीत डोवल ने कहा- 'पाक को यह सर्टिफिकेट देना- वह आतंकी नहीं, खुद आतंकवाद का शिकार है। यह भारत के लिए पहला कूटनीतिक झटका है। हम पच्चीस साल से पाक पर आतंकवादी वारदातों का आरोप लगा रहे थे। सबूत दे रहे थे। पहले पंजाब में। फिर कश्मीर में। अब पूरे देश में। इस आतंकवाद में साठ हजार से ज्यादा लोग मारे गए। हम इसके लिए पाक को ठीक ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे। पर अब नहीं ठहरा सकते।' अपने मनमोहन सिंह को यह दिव्य स्वप् ही आया- 'पाक भी आतंकवाद का शिकार है।' मनमोहन क्या इसकी व्याख्या करेंगे- पाक कहां के आतंकवाद का शिकार है? क्या मनमोहन ने यह कहकर अपने पैरों पर कुल्हाडी नहीं मारी? क्या अब बलूचिस्तान का सारा ठीकरा भारत के सिर नहीं फूटेगा? पाक ने इन ढ़ाई सालों में ऐसा क्या कर लिया। जो भारत पिछली बातें भूल जाए। मुशर्रफ ने यही तो कहा मनमोहन को। कहा- 'पिछली ताहि बिसार दो। आगे की सुध लो।' और अपने भोले मनमोहन ने मुशर्रफ पर भरोसा कर लिया। मुशर्रफ चाहते हैं- भारत वह वादा भूल जाए। जो छह जनवरी 2004 को वाजपेयी को दिया था। और अपने मनमोहन सिंह भूल गए। अलबत्ता पाक को भी आतंकवाद का शिकार बता दिया। जरा पड़ताल कर लें। ढ़ाई सालों में क्या फेरबदल हुआ। जो पाक आतंकवाद प्रायोजित देश से आतंकवाद के खिलाफ सहयोगी देश बन गया। पिछले बारह महीनों की ही पड़ताल कर लें। साल भर में भारत में जितनी आतंकी वारदातें हुई। उनमें चार सौ के करीब लोग मारे गए। आजादी के बाद का इतिहास देख लें। आतंक प्रभावित राज्यों को छोड़ दें। तो किसी एक साल में गैर आतंक प्रभावित राज्यों में आतंकियों के हाथों इतने लोग नहीं मरे। कश्मीर में घुसपैठ बढ़ चुकी। हिंसा भी बढ़ चुकी। जम्मू कश्मीर के सीएम गुलाम नबी ने हाल ही में कहा- 'पिछले तीन महीनों में घुसपैठ बढ़ गई। आईएसआई प्रायोजित आतंकवादी बढ़ गए। मैं नहीं समझता- यह मुशर्रफ की मर्जी के बिना संभव होगा।' मनमोहन सिंह ने पता नहीं गुलाम नबी को सुना या नहीं। पर उन ने सुरक्षा सलहाकार एमके नारायणन की भी नहीं सुनी। जिनने हाल ही में कहा था- 'भारत के परमाणु संयंत्र आतंकियों के निशाने पर।' पर नारायणन ने एक बात और कही। जो शायद मनमोहन सिंह ने गौर नहीं की। आपको याद होगा। अफगानिस्तान में एक भारतीय मारा गया- मनियप्पन। नारायणन ने कहा- 'पाक ने मनियप्पन के अपहरण और हत्या में तालिबान का सहयोग किया।' बेहतर होता- मनमोहन आतंकवाद के खिलाफ साझा मेकेनिज्म पर देश में सलाह मशविरा करते। बेहतर होता- अगर मनमोहन प्रत्यार्पण संधि करते। ताकि मुशर्रफ पर दाऊद को सौंपने का नैतिक दबाव पड़ता। पाक दाऊद को सौंप देता। तभी आतंकवाद के खिलाफ साझा मेकेनिज्म की बात होती। तो अक्लमंदी होती। मुशर्रफ ने अपना छह जनवरी 2004 का वादा तो निभाया नहीं। आतंकी शिविर तो बंद हुए नहीं। आतंकियों को आर्थिक मदद तो बंद हुई नहीं। आतंकी वारदातें तो घटी नहीं। अलबत्ता बढ़ गई। पाक तो हाथ से हमेशा इनकार करता रहा। फिर उससे क्या होगा साझा मेकेनिज्म।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115872891862972153?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115872891862972153/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115872891862972153' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115872891862972153'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115872891862972153'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/09/blog-post_19.html' title='साझा मेकेनिज्म अब तक का सबसे बड़ा कूटनीतिक झटका'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115864533324385717</id><published>2006-09-18T22:54:00.000-07:00</published><updated>2006-09-18T22:55:33.263-07:00</updated><title type='text'>आतंकवाद पर कन्फ्यूजिया गई मनमोहन सरकार</title><content type='html'>लालू के बिहार में हिंदी ऐसी ही हो गई। नीतिश के बावजूद बिहार लालू का ही कहना पड़ेगा। लालू ने बिहार का बंटाधार किया। पर रेल मंत्री बनकर आईआईएम में लेक्चरर हो गए। चारा घोटाले वाले लालू आईआईएम के स्टूडेंटस को क्या पढ़ाएंगे। आप खुद सोच लो। पर बात लालू की नहीं। बात लालू के बिहार की। जहां से हिंगलिश की शुरुआत हुई। वैसे इसका श्रेय लालू को देना ठीक नहीं। लालू तो तब पिक्चर में ही नहीं थे। जब बिहार में इंगलिश-हिंदी के मिक्चर से हिंगलिश बनी। नवभारत टाईम्स में कॉलम लिखा करते थे शरद जोशी। उन ने जब एक हैडिंग दिया- 'नर्भसा गए।' तो बिहार में कड़ा विरोध हुआ। बिहारियों ने शरद जोशी की मुखालफत की। पर देशभर में सराहा गया। कम से कम साहित्य जगत में तो सराहा ही गया। नर्भसा जाना, कन्फ्यूजिया जाना, टेंशनवा। जैसे शबदों का श्रेय बिहार को ही जाएगा। पर अब बात सरकार के कन्फयूजिया जाने तक आ पहुंची। आतंकवाद के मुद्दे पर सरकार कन्फ्यूजिया गई। समझ नहीं आ रहा। किस रास्ते पर जाए। एक तरफ अमेरिका का दबाव। दूसरी तरफ आईएसआई का आतंकवाद। जो थमने का नाम नहीं लेता। मुंबई बम धमाकों को ज्यादा देर नहीं हुई। मनमोहन ने मुंबई जाकर कहा था- 'एक तरफ आतंकवाद। दूसरी तरफ बातचीत नहीं चल सकती।' मतलब साफ था। मुंबई के बम धमाकों के लिए पाक को लताड़ रहे थे। जुलाई में होने वाली सचिव स्तरीय बातचीत भी रद्द कर दी थी। सेंट पीटर्सबर्ग में बुश ने इस बयान पर मनमोहन को आड़े हाथों लिया। तो घिग्घी बंध गई। अब जब उसी बुश के दबाव में आतंकवाद पर पाक से समझौता किया। तो अपने भावी विदेश सचिव शिवशंकर मेनन बोले- 'मुंबई बम धमाकों के लिए कभी पाक को जिम्मेदार नहीं ठहराया।' अमेरिका के दबाव में कितना झुकेगी मनमोहन सरकार। झुकने का यह सबूत काफी न हो। तो और भी सबूत है अपने पास। खुद बातचीत तोड़ी थी। खुद ही शुरु कर ली। बुश के दबाव में जो नया साझा बयान हुआ। उसकी जरा चीर-फाड़ करें। तो कई चीजें सामने आएंगी। अपन हमेशा पाक को आतंकवाद की फैक्टरी कहते रहे। दुनिया भर को इसके सबूत देते रहे। सबूत देते रहे आईएसआई की भूमिका के। अपन ने अमेरिका को 911 में आईएसआई की भूमिका के सबूत भी दिए। पर अब अपन ने वही बात कहनी शुरु कर दी। जो कारगिल के वक्त मुशर्रफ कहते थे। उन ने नहीं माना था- पाक फौज ने कारगिल में हमला किया। जिहादियों का हमला ही कहते रहे। पाक हमेशा कहता रहा- इन जिहादियों पर हमारा 'बस' नहीं। अब बुश के दबाव में मनमोहन सरकार ने वही कह दिया। अपने मेनन बोले- 'पाक में ऐसा तबका है। जो भारत में आतंकवादी वारदातें कर रहा है।' उन ने आगे कहा- 'ऐसे तबके से निपटने के लिए संस्थागत मेकेनिज्म जरुरी है।' यही है मनमोहन सिंह का नया समझौता- 'आतंकवाद से लड़ने के लिए ज्वाइंट मेकेनिज्म।' अपन ने अब तक तेईस देशों से ऐसे समझौते किए। जब-जब साझा मीटिंग हुई। गुप्तचर सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ। यानी अब अपनी रॉ की आईएसआई से मीटिंग होगी। पर देश का हर नागरिक जानता है। भारत-पाक समस्या की जड़ कोई और नहीं। आईएसआई ही है। आईएसआई का मुख्य काम भारत में आतंकवाद फैलाना है। पाक के जिस-जिस शासक ने आईएसआई का इशारा नहीं समझा। वह सत्ता में नहीं रहा। नवाज शरीफ ने खुद यह बात अपने इंटरव्यू में कही। सो एक बात आज ही समझ लें। अपन जो जानकारियां आईएसआई को देंगे। आईएसआई उसका बेजा इस्तेमाल करेगा। आईएसआई जो अपन को जानकारियां देगा। वह फिजूल की होंगी। यों इसका इम्तिहान तो दाऊद इब्राहिम पर ही हो जाएगा। अपन दाऊद के पाक में होने के सबूत देंगे। पाकिस्तान इनकार कर देगा। फिर कैसा ज्वाइंट मेकेनिज्म। कैसी साझी जांच। कैसी साझी रणनीति। यों मनमोहन से लेकर मेनन ने कहा- 'आतंकवाद पर भारतीय रुख में कोई फेरबदल नहीं।' पर मनमोहन की ओर से पहली बार कहा गया- 'पाक भी आतंकवाद का शिकार है।' इस पर जब मेनन से पूछा गया। तो उन ने कहा- 'क्या पाक आतंकवाद का शिकार नहीं।' अगर बलुचिस्तान में चली लोकतंत्र की लड़ाई को आतंकवाद कहा जाए। तो जरुर पाक आतंकवाद का शिकार है। अगर बात कश्मीर के शांतिपूर्ण समाधान की करें। तो पाक ने तीन लड़ाईयां करके देख ली। तीनों में हारा। सो दो ही तरीके बचे। आतंकवाद से भारत को कमजोर करना। और शांतिवार्ता का। दोनों ही तरीके एक साथ ही अपना रहा है पाक। यह बात अपने मनमोहन सिंह को मुंबई में भी पता थी। हवाना में भी पता थी। तो हुआ न अमेरिकी दबाव में समझौता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115864533324385717?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115864533324385717/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115864533324385717' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115864533324385717'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115864533324385717'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/09/blog-post_18.html' title='आतंकवाद पर कन्फ्यूजिया गई मनमोहन सरकार'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115760519176998096</id><published>2006-09-06T21:58:00.000-07:00</published><updated>2006-09-06T21:59:51.783-07:00</updated><title type='text'>'वंदे मातरम' के दो पैरों के विरोधी राष्ट्रभक्त नहीं</title><content type='html'>आज वह आखिरी दिन आ पहुंचा। वैसे तो वंदे मातरम के इतिहास में सात सितंबर का कोई महत्व नहीं। जिन शशि भूषण के कहने पर सरकार ने यह दिन तय किया। अपन ने उनसे पूछा। तो वह भी दिन का महत्व नहीं बता पाए। पर छोड़ो तारीख की बात। जब संस्कृति मंत्रालय ने एक तारीख तय कर ली। तो उस दिन वंदे मातरम देश भर में गाया ही जाए। जब 14 अगस्त 1947 की आधी रात को आजादी मिली। तो सबसे पहले वंदे मातरम ही गाया गया था। संसद के सेंट्रल हाल में सत्ता हस्तांतरण हुआ। डा. राजेंद्र प्रसाद ने कार्यवाही शुरू की। उन ने सुचेता कृपलानी से कहा- 'वंदे मातरम से शुरुआत करो।' यों तो वंदे मातरम आजादी के आंदोलन का तराना था। बकौल अमित्रसूदन भट्टाचार्य- 'किसी मुस्लिम नेता ने कभी वंदे मातरम की मुखालफत नहीं की।' अमित्रसूदन भट्टाचार्य ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की जीवनी लिखी। तो उन ने उस समय के सारे हालात को सामने रखा। हालात को बारीकी से पढ़ा। अमित्रसूदन कहते हैं- 'अंग्रेजों ने वंदे मातरम को हिंदू-मुस्लिम फूट का हथियार बनाया। तो कांग्रेस ने इस पर गौर किया।' आखिर कांग्रेस ने 1937 में रवींद्र नाथ टेगोर की रहनुमाई में कमेटी बनाई। कमेटी में नेहरू, सुभाष और आचार्य नरेंद्र देव भी थे। कमेटी ने कहा- 'वंदे मातरम के पहले दो पैराग्राफ में कहीं बुतपरस्ती नहीं। सो दो पैराग्राफ को राष्ट्रीय गीत के तौर पर कबूल किया जाए।' अब इन दो पैराग्राफ को लाजिमी करने पर भी एतराज हो। तो इस सरकार को डूब मरना चाहिए। जो न आजादी के दीवानों को सलाम कर सके। न उनकी शहादत पर आंसू बहा सकें। जिसे सिर्फ वोट दिखाई देते हों। जो वोटों की खातिर इतिहास भूल जाए। संस्कृति भूल जाए। आजादी के आंदोलन की शहादतें भूल जाए। ऐसे सत्तालोलुप स्वार्थी राजनीतिज्ञों को जितना कोसा जाए। उतना कम। जब कट्टरपंथी मुसलमानों ने वंदे मातरम का विरोध किया। तो अर्जुन सिंह को कहना चाहिए था- 'वंदे मातरम के दो पैराग्राफ राष्ट्रगीत हैं। उन्हें आजादी की आधी रात को भी गाया गया था। अब भी गाया जाएगा। कट्टरपंथियों को नफरत की आग फैलाने से बाज आना चाहिए।' अर्जुन सिंह ऐसा कहते। तो सरकार की धमक नजर आती। नजर आता- कुछ मुद्दे हैं। जिन पर समझौता नहीं कर सकती सरकार। अर्जुन सिंह से अब देश का भरोसा टूटने लगा। पर अर्जुन सिंह की गलती मनमोहन सुधार लेते। पर उन ने भी ऐसा नहीं किया। वह तो चुप्पी साधकर बैठ गए। वंदे मातरम जब लिखा गया था। तो 1876 में दो पैराग्राफ ही लिखे गए थे। बाद में उसमें तीन पैराग्राफ और जोड़े गए। आखिर जब वह देशभक्ति का तराना बना। तो सेक्युलरिज्म के लिए दो पैराग्राफ ही तय हुए। ताकि अंग्रेज फूट डालो और राज करो की नीति न अपना सकें। तब हिंदू-मुस्लिम नहीं भिड़े थे। पर आधुनिक देशभक्त अर्जुन सिंहों ने आज भिड़ा दिए। आज मुसलमानों को ही अर्जुन सिंहों को जवाब देना होगा। फूट डालो, राज करो के आधुनिक अंग्रेजों से निपटना होगा। अरविंद घोष ने 1906 में बंगाल से वंदे मातरम निकाला। तो लाल लाजपत राय ने लाहौर से। जो आज भी दिल्ली से छप रहा है। वंदे मातरम की वही आन, बान, शान तभी कायम होगी। जब सारा देश वंदे मातरम के वे दो पैरे गायेगा। जिस पर किसी को एतराज नहीं था। अपन को गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के फैसले पर हैरानी हुई। गुरु गोविंद सिंह तो खुद काली के भक्त थे। पूरे वंदे मातरम में दुर्गा पूजा ही तो है। पर सरकार अगर स्पष्ट करती। पहले दो पैराग्राफ की बात करती। तो समाज में फूट पड़ती ही ना। पर जब फूट डालना ही मकसद हो। तो कोई क्या करेगा। पर अपन पहले दो पैराग्राफ बता दें। ताकि आज 11 बजे सब मिलकर गा सकें। ''सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम। शस्य श्यामलाम मातरम। वंदे मातरम। शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम। फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम। सुहासिनीम सुमधुर भाषिणीम। सुखदाम वरदाम मातरम। वंदे मातरम। कोटि-कोटि कंठ कलकल निनाद कराले। कोटि-कोटि भुजैधृत खरकर वाले। अबला केनो मां एतो बले। बहुबल धारिणीम अनामितारिणीम। रिपुदल वारिणीम मातरम। वंदे मातरम।'' अपन इसका आरिफ मोहम्मद खान का किया उर्दू तर्जुमा भी बता दें। ताकि मुसलमान भाई चाहें तो उर्दू में गा सकें। तू भरी है मीठे पानी से। फल-फूलों की शादाबी से। दक्किन की ठंडी हवाओं से। फसलों की सुहानी फिजाओं से। तस्लीमात। मा तस्लीमात। तेरी रातें रोशन चांद से। तेरी रौनक सबज-ए-फाम से। तेरी प्यार भरी मुस्कान है। तेरी मीठी बहुत जुबान है। तेरी बाहों में मेरी राहत है। तेरे कदमों में मेरी जन्नत है। तस्लीमात। मा तस्लीमात। अपन यह भी बताते जाएं। पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्याक्ष मौलाना कलबे सादिक ने क्या कहा। उन ने कहा- 'अगर वंदे का मतलब सलाम है। तो वंदे मातरम पर कोई एतराज नहीं।'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115760519176998096?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115760519176998096/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115760519176998096' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115760519176998096'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115760519176998096'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/09/blog-post_06.html' title='&apos;वंदे मातरम&apos; के दो पैरों के विरोधी राष्ट्रभक्त नहीं'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115712064758352606</id><published>2006-09-01T07:22:00.000-07:00</published><updated>2006-09-01T07:24:07.610-07:00</updated><title type='text'>बारास्ता केरल बीजेपी के संगठन मंत्रियों की नई पौध</title><content type='html'>'इंडियन एक्सप्रेस' ने एक घोटाला खोला था। पेट्रोल पंपों की अलाटमेंट का। वैसे तो पेट्रोल पंप हमेशा पोलिटिशियन ही लूटते रहे। पर कांग्रेस यह काम बड़ी सफाई से करती रही। एनडीए राज में राजनीतिक सफाई की कमी थी। इसीलिए कांग्रेसी तौर-तरीके नहीं अपना सके। जब तहलका घोटाले में बंगारू लक्ष्मण नोटों की गड्डी लेते धरे गए। तो बीजेपी के एक मंत्री ने एक पूर्व कांग्रेसी मंत्री से पूछा था- 'आपने सालों-साल मलाई खाई। पर पत्ता तक नहीं फड़का। किसी को कुछ पता ही नहीं चलता था। आप करते कैसे थे?' पूर्व कांग्रेसी मंत्री ने जवाब दिया- 'हम पैसों का लेन-देन बाथरूम में करते थे।' भ्रष्टाचार के बारे में एक बात कहना गलत नहीं होगा। जो पकड़ा जाए, सो चोर। वैसे दूध का धुला कोई भी नहीं। अपन दूर नहीं जाते। एक छोटा सा उदाहरण दें। गर्मियों के दिनों में इंडिया गेट के आसपास शाम को सुकून मिलता था। सो भीड़ इतनी होती है, तिल धरने को जगह नहीं मिलती। आइसक्रीम की रेहड़ियों की भी लाइन लगी होती है। पर हर आइसक्रीम पर एक रुपया फालतू लगता है। हर रोज कम से कम सौ रेहड़ियां तो खड़ी होती होंगी। जैसे ही भीड़ छंटने लगती है। पुलिस वाले उगाही के लिए आ जाते हैं। हर रेहड़ी से ढाई सौ रुपया लिया जाता है। यानी हर रोज 25 हजार रुपए की पुलिसी रिश्वत। जो कांस्टेबल से लेकर एसीपी तक पहुंचती है। इसे कौन नहीं जानता। तो पोलिटिशियन क्यों पीछे रहें। 'इंडियन एक्सप्रेस' ने पेट्रोल पंपों की लिस्ट छापी। जिसमें सैकड़ों संघ परिवारी थे। जब एनडीए सरकार संघियों-भाजपाइयों को पेट्रोल पंप बांट रही थी। तो कांग्रेस उस से भी बड़ा खेल कर रही थी। वह इराक में तेल घोटाला कर रही थी। भाजपाई ठहरे परचूनिए। कांग्रेसी निकले थोक व्यापारी। एक ही सौदे में अरबों-खरबों का वारा-न्यारा। ईमानदार सिर्फ वही पोलिटिशियन है। जिसे मौका नहीं मिलता। बात हो रही थी पेट्रोल पंप घोटाले की। जिसमें राजग राज में भी कांग्रेसी पीछे नहीं रहे। अपनी गिरिजा व्यास भी इस लिस्ट में थीं। यों कांग्रेस राज की बातें याद करें। तो आप पिछले 50 सालों को याद करें। वह कौन सा शहर होगा, वह कौन सा कस्बा होगा, वह कौन सा हाई-वे होगा। जहां किसी कांग्रेसी का पेट्रोल पंप नहीं होगा, गैस एजेंसी नहीं होगी। आप पूरे देश में सर्वेक्षण करवा लें। नबे फीसदी पेट्रोल पंप, गैस एजेंसियां पोलिटिशियन के पास होंगी। उनमें से नबे फीसदी पोलिटिशियन दूसरे धंधे भी करते होंगे। ज्यादातर पेट्रोल पंप, गैस एजेंसियां सांसदों-विधायकों के पास होंगी। या पूर्व सांसदों, पूर्व विधायकों के पास होंगी। पर अपन बात कर रहे थे राजग राज के बंदरबांट की। 'इंडियन एक्सप्रेस' ने तीन साल बाद अपनी पुरानी स्टोरी फिर याद की। गुरुवार को 'एक्सप्रेस' की लीड थी- 'हमने केरल में 18 करोड़ रुपए के पेट्रोल पंप बेचे।' यह खबर थी- बीजेपी तिरुअनंतपुरम उपचुनाव की हार के बाद बनी समीक्षा कमेटी की रपट पर आधारित। तीन मेंबरी कमेटी की रपट में दावा किया गया- 'राजग राज में पेट्रोल पंपों की अलाटमेंट में 18 करोड़ रुपए बने। पर सिर्फ दो करोड़ रुपए का हिसाब-किताब मौजूद है। बाकी पैसा बीजेपी का संगठन मंत्री बीपी मुकंदन और प्रोफेसर नारायण नायर चट कर गए।' वैसे गुरुवार को ही जब यह खबर छपी। तो केरल बीजेपी के प्रवक्ता बीके शेखर ने एक बयान जारी किया। जिसमें कहा गया- 'पार्टी को न तो ऐसी कोई शिकायत मिली। न पार्टी ने जांच कमेटी बिठाई। इसलिए यह सारी खबर बेसिर-पैर की है।' पर पेट्रोल पंपों का घोटाला कौन नहीं जानता। पोलिटिशियन पेट्रोल पंप- गैस एजेसियां लेते हैं। तो यह भी जानते हैं- देने वाले की जेब भी भरनी होगी। सो इस खबर में कहा गया- 'प्रोफेसर नायर ने एक मीटिंग में कहा था- वैसे तो पेट्रेल पंप का रेट 25 लाख है। पर पार्टी वर्करों को 20 लाख में मिल जाएगा।' यों यह सब पार्टी वर्करों पर लागू नहीं होता होगा। कांग्रेस और भाजपा के अलग-अलग पैमाने होते होंगे। एक्टिव वर्करों को बिना रिश्वत के भी मिलते होंगे। पर बात इस घोटाले से भी बड़ी। मुकंदन बीजेपी के संगठन मंत्री हैं। संजय जोशी भी संगठन मंत्री हैं। बीजेपी में आज-कल संगठन मंत्रियों की पौं-बारह है। अपन को बीजेपी का एक प्रदेश अध्यक्ष बता रहा था- 'बीजेपी के जिस नेता के पास दो-तीन मोबाइल फोन देखो। पॉम देखो। धूप का विदेशी चश्मा और चमकता हुआ पैन देखो। तो समझ लो वह संगठन मंत्री है।' अपन तो कृष्णलाल शर्मा के जमाने के संगठन मंत्री जानते थे। सुंदर सिंह भंडारी के जमाने के संगठन मंत्री जानते थे। कुशाभाऊ ठाकरे के जमाने के संगठन मंत्री जानते थे। पर बीजेपी के संगठन मंत्रियों की यह नई पौध पार्टी को कहां ले जाएगी। बीजेपी जाने या बाकी संघ परिवारी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115712064758352606?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115712064758352606/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115712064758352606' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115712064758352606'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115712064758352606'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/09/blog-post.html' title='बारास्ता केरल बीजेपी के संगठन मंत्रियों की नई पौध'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115700039541239478</id><published>2006-08-30T21:58:00.000-07:00</published><updated>2006-08-30T21:59:55.440-07:00</updated><title type='text'>संघ परिवार को कराना चाहिए महामृत्युंजय जाप</title><content type='html'>संघ परिवार के दिन अच्छे नहीं चल रहे। संघ परिवार में बीजेपी भी शामिल। वीएचपी भी। और एबीवीपी भी। जबसे एनडीए के हाथ से सत्ता गई। बुरे दिन शुरु हो गए। पहले जिन्ना को लेकर संघ परिवार में महाभारत हुआ। फिर पीएमओ में जासूसी का भंडाफोड़ जसवंत सिंह ने सेल्फ गोल किया। वैसे आडवाणी की जिन्ना पर टिप्पणी राजनीतिक लिहाज से कमाल की थी। कांग्रेस में हड़कंप मच गया था। यूपीए के सारे दल आडवाणी का समर्थन करने लगे। पर इस मौके को संघ परिवारियों ने गंवा दिया। बल्कि मूर्खतापूर्ण ढंग से गंवा दिया। उसके बाद बीजेपी हावी नहीं हो पाई। संघ परिवार का झगड़ा ही सुर्खियों में रहा। संघ ने आडवाणी का इस्तीफा लेकर ही छोड़ा। इधर आडवाणी का इस्तीफा हुआ। उधर बीजेपी के महासचिव संजय जोशी सेक्स स्कैंडल में फंस गए। भले ही अपने शिवराज सिंह चौहान ने लीपापोती करवा दी। पर संजय जोशी की बेगुनाही किसी के पल्ले नहीं पड़ रही। यह बीजेपी की कमजोर लीडरशिप का ही नतीजा है। संजय जोशी को दोबारा महासचिव बनाना पड़ा। बामुश्किल बीजेपी अपने पैरों पर खड़ी हुई थी। वापस संघ की बैसाखियों पर खड़ी हो गई। बीजेपी इन संकटों से निकली ही थी। प्रमोद महाजन की हत्या हो गई। फिर महाजन का बेटा राहुल ड्रग सेवन में फंस गया। इस बीच कई मौके आए। जब यूपीए सरकार कटघरे में खड़ी होती। पर बीजेपी का नेतृत्व इतना कमजोर हो चुका। दब्बू हो चुका। कांग्रेस ने ऐसे दब्बू विपक्ष की परवाह ही नहीं की। परमाणु समझौते पर घेरने का मौका आया। महंगाई पर घेरने का मौका आया। तेल घोटाले पर घेरने का मौका आया। किसानों की आत्महत्याओं पर घेरने का मौका आया। तो जसवंत सिंह अपनी 'ए कॉल टू ऑनर' लेकर आ गए। और अब जब दिल्ली की टूट-फूट के बीच दिल्ली यूनीवर्सिटी के चुनाव हो रहे थे। तो संघ परिवारियों के लिए अच्छा मौका था। एक तो दिल्ली के लोग महंगाई से त्रस्त। दूसरे तोड़-फोड़ से। और तीसरा वंदे मातरम का भावनात्मक मुद्दा। पर इन सब पर हावी हो गया उौन में एबीवीपी का हुड़दंग। दिल्ली यूनीवर्सिटी के चुनाव थर्मामीटर माने जाते हैं। यूनीवर्सिटी में एनएसयूआई जीत जाए। तो मानो- कांग्रेस की साख सातवें आसमान पर। यूनीवर्सिटी में एबीवीपी जीत जाए। तो मानो अगली बारी बीजेपी की। पिछले कई सालों से यूनीवर्सिटी पर एनएसयूआई का कब्जा है। यह अच्छा मौका था। जब एबीवीपी झंडे गाड़ती। कांग्रेस की धुकधुकी बंध चुकी थी। कांग्रेस दफ्तर में मीटिंगें शुरु हो चुकी थी। हाल ही की मीटिंग में दिल्ली के सारे कांग्रेसी सांसद, मंत्री, पार्टी के महामंत्री शामिल हुए। चारों उम्मीदवार सामने बैठे थे। चुनावी फंड का बंदोबस्त किया गया। प्रचार तंत्र आला नेताओं ने संभाला। पर उधर एबीवीपी ने उौन में ऐसा काम कर दिया। जिससे गुरु-शिष्य के रिश्ते कलंकित हो गए। उौन माधव कॉलेज में हुई यह शर्मनाक घटना। पोलिटिकल साइंस के लेक्चरर प्रोफेसर एचएस सभ्रवाल की हत्या हो गई। कांग्रेस को बैठे-ठाले मुद्दा मिल गया। बीजेपी अगर यूपीए की तीन घटनाओं से सबक ले। तो अपनी साख अब भी बचा सकती है। नटवर सिंह तेल घोटाले में फंसे। तो उनके बचाव के बावजूद कांग्रेस ने जांच कराई। इस्तीफा लिया। फिर दूसरी घटना- गृह राज्यमंत्री माणिकराव गावित पर माफिया से फोन पर बात का आरोप लगा। गावित ने फौरन खुद को संसदीय काम से अलग कर लिया। किसी भी एजेंसी से जांच की चुनौती दे दी। सरकार ने फौरन सीबीआई जांच करा दी। तीसरी घटना- ना, ना करते भी सरकार ने वार रूम लीक मामले में अभिषेक वर्मा को गिरफ्तार करा दिया। तीनों ही मामलों में सरकार बेदाग हो गई। जिसे फंसना था, फंसा। जिसे बचना था, बचा। अब यही फार्मूला अपने शिवराज सिंह चौहान अपनाते। कांग्रेस की मांग पर सीबीआई जांच का एलान कर दें। तो दिल्ली में एबीवीपी को बचाव का कोई हथियार तो मिलता। पर अपने शिवराज चौहान तो सीबीआई जांच से साफ मुकर गए। कहते हैं- 'किसी का बचाव नहीं किया जाएगा।' इस पर कौन भरोसा करेगा। अपन को लगता कुछ और है। जैसे एनएसयूआई के कुछ छात्र गिरफ्तार किए गए। उससे मामला कहीं राजनीतिक न हो जाए। यों यूथ कांग्रेस-एनएसयूआई भी दूध की धुली नहीं। यूथ कांग्रेस के अधिवेशन से लौटती ट्रेन में मिले निरोधों की घटना पुरानी हो गई। लोग भूल गए होंगे। पर तंदूर कांड की घटना तो इतनी पुरानी नहीं हुई। सुशील शर्मा अभी भी जेल से नहीं छुटा। पर अपने रविशंकर यह कहकर पल्ला नहीं छुड़ा सकते- एबीवीपी भाजपा की छात्र शाखा नहीं। माना- एबीवीपी बीजेपी की छात्र शाखा नहीं। पर संघ परिवार का हिस्सा तो है। सो बेहतर हो। अगर शिवराज चौहान सीबीआई जांच करा दें। संघ परिवार मिल जुलकर महामृत्युंजय जाप करवा ले।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115700039541239478?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115700039541239478/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115700039541239478' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115700039541239478'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115700039541239478'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_115700039541239478.html' title='संघ परिवार को कराना चाहिए महामृत्युंजय जाप'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115692140763487434</id><published>2006-08-30T00:02:00.000-07:00</published><updated>2006-08-30T00:03:27.646-07:00</updated><title type='text'>देशभक्त मुस्लिम मस्जिदों में गाएं वंदे मातरम</title><content type='html'>जैसे-जैसे सात सितंबर नजदीक आने लगी। वंदे मातरम का विवाद बढ़ने लगा। कट्टरपंथी मुसलमान खुलकर वंदे मातरम के खिलाफ बोलने लगे। शुरुआत हैदराबाद के उलेमाओं ने की थी। वैसे तो वंदे मातरम का विवादास्पद होना। अपने आप में शर्म की बात है। इसके कसूरवार हैं अर्जुन सिंह। जिनने उलेमाओं की धमकी के बाद वंदे मातरम पर घुटने टेक दिए। वंदे मातरम आजादी का तराना था। उसे सिर्फ स्कूलों में ही क्यों गाया जाए। सात सितंबर को सुबह ग्यारह बजे पूरे देश में क्यों न गाया जाए। जब अंग्रेजों के राज में हिंदू-मुस्लिम मिलकर गाते थे। गलियों-बाजारों में गाया जाता था। तब मुसलमान विरोध नहीं करते थे। तब किसी ने नहीं कहा- 'मुसलमान भारत को अपनी मां नहीं मान सकता। मुसलमान खुदा के अलावा किसी के सामने सिर नहीं झुका सकता। मुसलमान किसी और की इबादत नहीं कर सकता।' तो अब यह सवाल क्यों? जो मुसलमान भारत में रह गए। वे तो जुनूनी कतई नहीं थे। वे उदारवादी मुसलमान थे। जो भारत को अपनी सरजमीं मानते थे। भारत को मां भी मानते थे। अबुल कलाम जैसे मुसलमानों के राजनीतिक नेता नहीं रहे। तो कांग्रेस के लिए मुसलमान सिर्फ वोटर बन गया। धीरे-धीरे उलेमा मुसलमानों के नेता बन गए। वे उसी तरह का जहर बोने लगे। जैसा बंटवारे के समय बोया गया था। कांग्रेस इस उलेमाई कट्टरवाद के आगे झुक गई। तो झुकती चली गई। शाहबानो वाले मामले में तो हद हो गई। उसके बाद भी कांग्रेस ने सबक नहीं लिया। अभिषेक मनु सिंघवी सोमवार को कह रहे थे- 'कांग्रेस ने 1937 की कार्यसमिति में ही तय कर लिया था- वंदे मातरम लाजिमी नहीं होगा।' अगर यह बात सच थी। तो मुस्लिम तुष्टीकरण 1937 में ही शुरु हो चुका था। पर यही सच नहीं। सच यह है- आजादी के बाद भी गांधी वंदे मातरम को राष्ट्र गान बनाना चाहते थे। पर नेहरू ने गांधी की नहीं चलने दी। फिर भी वह वंदे मातरम को राष्ट्रगीत बनाने से नहीं रोक पाए। अगर 1937 का फैसला सही होता। तो 1950 में वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत घोषित नहीं किया जाता। कांग्रेस ने 1905 के वाराणसी अधिवेशन में वंदे मातरम अपनाया। यह बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लिखी भारत मां की वंदना है। वंदे मातरम आजादी के लिए जोश भरने का तराना था। तब हिंदू-मुस्लिम में भेद नहीं था। सब भारत मां की संतान थे। जो भारत मां को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराना चाहते थे। सभी मिलकर गलियों में वंदे मातरम के नारे लगाते। तो अंग्रेज हुकुमत चिढ़ती। वंदे मातरम गाने वालों पर लाठियां बरसाती। आजादी के बाद कितना फर्क आ गया। अब उसी वंदे मातरम के नाम पर कांग्रेसी चिढ़ने लगे। कांग्रेस देश को किस मुकाम पर ले आए। देशभक्ति का वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत भी संघ परिवारियों को सौंप दिया। खुद देशभक्तों के खिलाफ खड़ी हो गई। बेहतर होता- यूपीए सरकार इस मुद्दे पर अड़ जाती। सात सितंबर को वंदे मातरम वैसे ही गाया जाता। जैसा आजादी से पहले गाया जाता था। देश भर में देशभक्ति का जज्बा पैदा होता। पर अफसोस। अब यह जज्बा चाहता कौन है? पिछले दिनों राज्यसभा में जयप्रकाश अग्रवाल ने एक सवाल उठाया। सवाल था- 'स्वतंत्रता सेनानियों के साथ न्याय क्यों नहीं हो रहा?' उन ने एक विधवा का जिक्र किया। जो स्वतंत्रता सेनानी की पत्नी थी। जो अब दिल्ली में हर चीज की मोहताज है। इस सवाल को जयप्रकाश ने भावुक बना दिया। यह भावुकता जयप्रकाश ही पैदा कर सकते थे। जिनका पूरा परिवार स्वतंत्रता सेनानी था। सदन में माहौल गर्म हो गया। गृहमंत्री पाटिल के पास कोई वाजिब जवाब नहीं था। जयप्रकाश और भावुक होकर उत्तेजित हो गए। तो पाटिल का जवाब सुन सब सन्न रह गए। पाटिल ने कहा- 'ज्यादा भावुकता दिखाने की जरुरत नहीं।' जब स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति मंत्रियों का यह रवैया हो। तो वंदे मातरम के प्रति भावुकता कहां होगी। यह एक ही गीदड़भभकी से अर्जुन सिंह के पलटने से भी साबित हुआ। देशभक्ति चरमरा कर रह गई। वोट ही सब कुछ हो गया। वक्त था- उदारवादी मुसलमानों को कट्टरपंथियों के खिलाफ खड़ा करने का। पर यूपीए सरकार ने यह मौका गंवा दिया। उल्टा कट्टरपंथी हावी हो गए। सिर्फ मुस्लिम कट्टरपंथी ही नहीं। हिंदू कट्टरपंथी भी तलवारें निकालकर सामने आ गए। मंगलवार को जैसी आग अशोक सिंघल ने उगली। उससे सदभाव पैदा नहीं होगा। उन ने गुजरात और बाबरी ढ़ांचे की याद दिलाकर जहर उगला। ऐसे बयानों से विद्वेष ही पैदा होगा। यही वक्त है। उदारवादी मुसलमान सामने आएं। सात सितंबर को मस्जिदों में वंदे मातरम गाएं। ताकि कोई भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति पर शक करने की हिम्मत न कर सके। मुसलमानों को तो फख्र होना चाहिए। सबसे बढ़िया वंदे मातरम ए.आर. रहमान ने गाया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115692140763487434?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115692140763487434/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115692140763487434' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115692140763487434'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115692140763487434'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_30.html' title='देशभक्त मुस्लिम मस्जिदों में गाएं वंदे मातरम'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115639518696835545</id><published>2006-08-23T21:50:00.000-07:00</published><updated>2006-08-23T21:53:06.980-07:00</updated><title type='text'>मीडिया की आलोचना से सकपकाए सांसद</title><content type='html'>इसे कहते हैं- झट मंगनी, पट शादी। सांसदों के वेतन-भत्ते चुटकियों में बढ़ गए। मनमोहन सिंह को एलान के बाद छठा वेतन आयोग बनाने में छह महीने लगे। अब आयोग पता नहीं कितने साल बाद रपट देगा। पर सांसदों के वेतन-भत्ते झट मंगनी, पट शादी की तरह बढ़ गए। इधर केबिनेट का फैसला हुआ। उधर बुधवार को लोकसभा की मोहर लग गई। अब गुरुवार को राज्यसभा की मोहर भी लग जाएगी। फिर यह लाभ का पद तो है नहीं, जो राष्ट्रपति दस्तखत करने में देर लगाएंगे। वैसे अब वेतन-भत्ते उतने कर दिए। लाभ के पद जैसा ही हो गया। पर मजा तब आया। जब वामपंथियों ने वेतन-भत्ते बढ़ाने की मुखालफत की। वामपंथियों की नौटंकी का जवाब नहीं। लाभ के पदों पर सबसे ज्यादा वामपंथी सांसद ही थे। जब अपनी राज्य सरकारों से लाभ के पद मिल रहे हों। तो वेतन-भत्ता बढ़े या घटे। क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी वामपंथियों की नैतिकता का खुलासा करते जाएं। वामपंथी सांसदों का सारा वेतन पार्टी फंड में चला जाता है। उनके घर में तो जाता नहीं। सो नैतिकता का लबादा ओढ़ने में क्या नुकसान। अपन को बुधवार को ही कोटा के किसी अरविंद सोरल की चिट्ठी मिली। जिनने वामपंथियों पर जमकर गुस्सा निकाला। उन ने कुछ गुस्सा न्यापालिका और मीडिया पर भी उतारा। पर लबोलुवाब यह था- तुच्छ स्वार्थों से भरे हैं वामपंथी। वेतन-भत्ते के मामले में यह बात सही साबित हुई। पैसा अपनी जेब में आता, पार्टी खाते में न जाता। तो वामपंथियों के तेवर ऐसे न होते। जैसे बुधवार को लोकसभा में दिखे। वासुदेव आचार्य की टिप्पणी बड़ी मजेदार रही। बोले- 'बड़ी विडंबना है, कानून बनाने वाले खुद के लाभ के लिए कानून बना रहे हैं।' इन वासुदेव आचार्य महाशय से कोई पूछे- लाभ के पदों का बिल किसने पास किया। यह बात तब क्यों नहीं याद आई। उस समय सोमनाथ चटर्जी ने क्यों नहीं कहा- 'कानून मत बदलो, चुनाव आयोग को फैसला करने दो।' लाभ के पद हासिल करने के लिए कानून बनाएंगे। तो जायज। वेतन-भत्ते बढ़ाने का कानून बनाएंगे, तो नाजायज। वामपंथियों के कुतर्को का भी जवाब नहीं। गुरुदास दासगुप्त भी उन लोगों में थे। जिनने सरकार पर फौरन लाभ के पद का बिल पास करवाने का दबाव डाला। वेतन-भत्तों पर गुरुदास का रुख बदला हुआ था। बोले- 'किसान आत्महत्या कर रहे हैं। देश में आर्थिक संकट है। ऐसे में सांसदों को अपना वेतन-भत्ता बढ़ाना शोभा नहीं देता।' बीजू जनता दल के प्रसन्ना आचार्य की टिप्पणी भी मौजू रही। बोले- 'या तो वामपंथी बढ़ा हुआ वेतन न लें। अगर ले तो प्रधानमंत्री राहत कोष में दे दें।' गुरुदास दासगुप्त का कथन ईमानदारी पूर्ण होगा। तो जरुर प्रसन्ना आचार्य की सलाह पर अमल करेंगे। अब वामपंथी कुछ करें। और ममता चुप रहे। ऐसा हो नहीं सकता। सो ममता की खरी-खरी भी सुनते जाएं। ममता ने कहा- 'लाभ के पद के लिए आप फटाफट कानून बनाते हैं। वहां से सरकारी खर्चे पर दो-दो गाड़ी रखते हैं। दोनों जगह से वेतन-भत्ते लेते हैं। और यहां नौटंकी करते हैं। ईमानदार हैं तो डबल काम करिए, पर वेतन एक जगह से लीजिए।' पर लाख टके का सवाल दूसरा। वामपंथियों को पता था- बिल तो पास होगा ही। सो विरोध कर नैतिकता का लबादा ओढ़ने में क्या जाता है। यों सारे देश को भी सांसदों का ऐसे वेतन बढ़ाना जंचा नहीं होगा। पर वामपंथियों को एतराज का हक नहीं। बंगाल में तो खुद वामपंथियों की सरकार है। जरा पूछिए- वहां विधायकों का वेतन कौन बढ़ाता है। भत्ते और सहूलियतें भी इतनी। कि सुनकर हैरान हो जाए। ममता ने खुलासा किया- 'बंगाल में किसी एमएलए को चश्मा लग जाए। तो वह पच्चीस हजार रुपए तक का चश्मा खरीद सकता है।' अब वामपंथियों को काटो, तो खून नहीं। पर हंगामें में कोई कमी नहीं। सच हमेशा कड़वा ही होता है। सो ममता की खरी-खरी से वामपंथियों को जोरदार मिर्ची लगी। वामपंथी सचमुच वेतन-भत्ते बढ़ने के खिलाफ होते। तो यूपीए सरकार की हिम्मत नहीं थी- बिल पास करवा सकता। पर लाख टके का सवाल वामपंथियों की नौटंकी नहीं। लाख टके का सवाल है- क्या आम आदमी की कीमत पर इतने वेतन-भत्ते बढ़ने चाहिए। कांग्रेस आम आदमी के नाम पर सत्ता में आई थी। या खास आदमियों के वेतन-भत्ते बढाने के नाम पर। क्या सरकार गिना सकती है- उसने आम आदमी के लिए क्या-क्या किया। सरकारी कर्मचारियों पर बोझ घटा या बढ़ा। आम आदमी पर बोझ घटा या बढ़ा। आटा-चावल सस्ता हुआ या महंगा। दाल-सब्जी सस्ती हुई या महंगी। घर बनाना सस्ता हुआ या महंगा। यही है लाख टके का सवाल। यह सवाल मीडिया ने उठाया। तो सांसदों ने मीडिया को भी जमकर लताड़ा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115639518696835545?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115639518696835545/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115639518696835545' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115639518696835545'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115639518696835545'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_23.html' title='मीडिया की आलोचना से सकपकाए सांसद'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115622125180686279</id><published>2006-08-21T21:33:00.000-07:00</published><updated>2006-08-21T21:34:11.823-07:00</updated><title type='text'>वंदे मातरम नहीं, 'वतन है सारा जहां हमारा'</title><content type='html'>देश के बंटवारे पर अब फिर सोचना पड़ेगा। कट्टरपंथी मुसलमानों ने पाक बना लिया। फिर भी गांधी-नेहरू ने भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं बनाया। तब उन ने यह नहीं सोचा था- एक दिन कट्टरपंथी मुसलमान फिर देश को अपने इशारों पर नचाएंगे। गांधी-नेहरू ने एक ऐसे भारत का सपना दिखाया था। जिसमें सबके लिए कानून बराबर होगा। पर आज अपन सोचें। क्या गांधी-नेहरू के वंशजों ने ऐसा भारत बनने दिया? गांधी की चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई थी। जब नेहरू ने 'हिंदू कोड बिल' लाकर सपना तोड़ दिया। डा. राजेंद्र प्रसाद ने लंबा समय बिल रोका। पर आखिर तक नहीं रोक सके। बस वहीं से शुरुआत हुई समान नागरिक संहिता के चीर हरण की। मुस्लिम बराबरी के हक वाले नागरिक नहीं रहे। अलबत्ता सत्ता दिलाने वाले वोट बन गए। समान नागरिक संहिता का मामला कोर्ट में गया। तो जस्टिस कुलदीप सिंह ने कहा था- 'जो मुसलमान बंटवारे के समय भारत में रह गए। उन्हें अच्छी तरह पता था- भारत में समान नागरिक संहिता बनेगी। जो समान नागरिक संहिता नहीं चाहते थे। उनके लिए पाक जाने का रास्ता खुला था।' पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की आलोचना हुई। कांग्रेसियों के लिए मुस्लिम वोट बन चुके। तो वामपंथियों के लिए अमेरिका के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय हथियार। वामपंथियों के लिए भारत उतना महत्वपूर्ण नहीं। जितना रूस-चीन प्रेम और अमेरिका विरोध। पहले समान नागरिक संहिता का सपना टूटा। अब तो राष्ट्र गीत को भी बदलने की बात शुरू हो गई। मुसलमानों को उस वंदे मातरम पर आपति है। जो आजादी के आंदोलन का तराना था। जो कांग्रेस के हर अधिवेशन में गाया जाता था। कांग्रेस पहले बंटवारे के लिए झुकी। अब वंदे मातरम के मुद्दे पर भी झुकना शुरू हो गई। यह साल वंदे मातरम का शताबदी वर्ष है। अपन को याद है- जब कल्याण सिंह यूपी के सीएम थे। तो उन ने एक फरमान जारी किया था- 'हर स्कूल में वंदे मातरम हर रोज गाया जाएगा।' सोमनाथ चटर्जी ने इसकी कड़ी आलोचना की। आलोचना में कांग्रेस भी शामिल हुई। अब जब वंदे मातरम की शताबदी पर अर्जुन सिंह ने मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी। सारे स्कूलों में सात सितंबर को एक साथ वंदे मातरम गाने की हिदायत दी। तो अपने कान तभी खड़े हुए थे। आखिर वही हुआ। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने मुखालफत शुरू कर दी। वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी कह दिया। शाही इमाम का फतवा जारी हो गया। सिर्फ इतना ही नहीं। सोमवार को मुस्लिम सांसद भी वंदे मातरम के विरोध पर उतर आए। तो कांग्रेस सरकार ने घुटने टेक दिए। अर्जुन सिंह ने कहा- 'स्कूलों में राष्ट्र गीत गाना जरूरी नहीं। जिसकी मर्जी हो गाए, जिसकी मर्जी हो, न गाए।' अपन को डर है। कहीं वंदे मातरम की शताबदी वर्ष में संसद में वंदे मातरम गाना बंद ही न हो जाए। सरकार को झुकते देखा। तो मुस्लिम कट्टरपंथी शेर हो गए। सांसद इलियास आजमी ने राष्ट्र गीत बदलने की मांग रख दी। कहा- 'वंदे मातरम की जगह अल्लामा इकबाल का गीत गाया जाए- 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।' वैसे बात चली, तो बताते जाएं। अल्लामा इकबाल की देशभक्ति के बारे में। बंटवारे की रूपरेखा चौधरी रहमत अली खान ने रखी थी। अल्लामा इकबाल पाकिस्तान के स्वप् दृष्टा बन गए थे। रहमत अली और इकबाल के सपने का कूटनीतिक इस्तेमाल किया जिन्ना ने। बंटवारे के हिमायती होते ही अल्लामा इकबाल ने अपना वह गीत बदल दिया। जिसमें उन ने कहा था- 'हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा।' बदल कर उन ने किया- 'चीनो अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा, मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा।' जिस अल्लामा इकबाल का गीत इलियास आजमी ने गाया। उन्हीं अल्लामा इकबाल ने नफरत का बीज बोया। सारी दुनिया को मुस्लिम बनाने का सपना है इस गीत में। इजराइल हो या अमेरिका। चेचन्या हो या भारत। साइप्रस हो या इंडोनेशिया। लेबनान हो या फिलिस्तीन। सब जगह एक ही जंग- सारे जहां को मुस्लिम वतन बनाने की। सारे जहां को मुस्लिम वतन बनाने के लिए छिड़ा हुआ है आतंकवाद। पर अपने देश में उन्ही की पैरवी हो रही है। इतवार-सोमवार को पार्लियामेंट एनेक्सी में एक सेमिनार हुआ। मुद्दा था- आतंकवाद। देश भर से मुस्लिमपरस्त इकट्ठे हुए। रहनुमा बने महेश भट्ट। बोले- 'मीडिया मुसलमानों को आतंकवादी बता रहा है। मीडिया पर रोक लगनी चाहिए। मीडिया पश्चिमी ताकतों के हाथ का खिलौना बन गया।' जरूर इस सम्मेलन पर भी सरकार की सरपरस्ती होगी। वरना पार्लियामेंट एनेक्सी में होता कैसे। पता नहीं आतंकवादियों की पैरवी क्यों शुरू हो गई। इस देश का अब क्या होगा। कोई नहीं जानता। यहां राष्ट्र गीत वंदे मातरम का विरोध होता है। तो कोई महेश भट्ट नहीं बोलता। यहां समान नागरिक संहिता का विरोध होता है। तो कोई महेश भट्ट नहीं बोलता। यहां कश्मीरी पंडित दर-दर भटकते हैं। तो कोई महेश भट्ट नहीं बोलता। महेश भट्ट यहां एक शख्स नहीं। महेश भट्ट यहां कांग्रेस है। महेश भट्ट यहां माकपा है। महेश भट्ट यहा ंसपा है, बसपा है, तेलुगुदेशम है। क्योंकि मुस्लिम नागरिक नहीं, वोटर हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115622125180686279?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115622125180686279/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115622125180686279' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115622125180686279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115622125180686279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_21.html' title='वंदे मातरम नहीं, &apos;वतन है सारा जहां हमारा&apos;'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115596784882543660</id><published>2006-08-18T23:09:00.000-07:00</published><updated>2006-08-18T23:10:48.836-07:00</updated><title type='text'>तो 'सेंस आफ हाउस' शेखावत के पक्ष में</title><content type='html'>कालीदास गजब के कवि थे। आए दिन राजा भोज के दरबार में कसीदे पढ़े जाते। एक दिन राजा भोज ने कहा- 'तुम समझो मैं मर गया। मेरे मरने पर तुम क्या कहोगे।' कालीदास ने कहा- 'मैं इस मुद्दे पर कुछ नहीं कह सकता।' राजा भोज इस बात से खफा हो गए। उन ने कहा- 'मनाही की सजा जानते हो?' कालीदास ने कहा- 'भले ही आप मुझे देश निकाला दे दो। मैं इस पर कुछ नहीं कह सकता।' आखिर वही हुआ। जो राजा के खफा होने पर होना था। कालीदास को देश निकाला दे दिया गया। वह जंगल में जाकर रहने लगे। कुछ महीनों बाद राजा भोज को कालीदास की याद आई। वह भेष बदल कर जंगल में गए। कालीदास को खोजा। कालीदास के मिलते ही उनसे बोले- 'जानते हो राजा भोज मर गया।' यह सुनते ही कालीदास बोले- 'अद्यधारा निराधारा, निरालबा सरस्वती, पंडिता खंडिता सर्वे, भोज राजो दिवंगते।' मतलब यह कि भोज राजा के मरते ही अब धारा नगरी का आधार खत्म हो जाएगा। सरस्वती नदी का पानी खत्म हो जाएगा। विद्वानों का सम्मान खत्म हो जाएगा। यह सुनते ही राजा भोज ने कहा- 'यही बात तुम पहले कह देते। तो बनवास ही न होता।' प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती। वह भैरोंसिंह शेखावत हों, या सोमनाथ चटर्जी। शुक्रवार को राज्यसभा में शेखावत की प्रशंसा में कसीदे गढ़े गए। तो लोकसभा में सोमनाथ चटर्जी प्रशंसा के एक वाक्य को तरसते रहे। चटर्जी कह रहे थे- 'मैंने शून्यकाल में 20 मुद्दों पर भाषण करवा दिए। अच्छा काम करता हूं। कभी-कभी मेरी प्रशंसा किया करो।' प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती। शुक्रवार को राज्यसभा में शेखावत ने भी खूब प्रशंसा लूटी। पर प्रशंसा लूटने के लिए शेखावत को राजा भोज नहीं बनना पड़ा। आज के कालीदास कभी बनवास नहीं झेलते। बस मौका मिलना चाहिए, शुरू हो जाएंगे। मौजूदा सांसदों के सामने कभी शेखावत ऐसा प्रस्ताव रखते। तो उन्हें राजा भोज की तरह कालीदासों का इनकार नहीं सुनना पड़ता। पर जब कालीदास को पता चला- जो मैंने नहीं कहा था। वह राजा भोज ने चालाकी से कहलवा लिया। तो कालीदास ने अपने ही वाक्य को बदल डाला। कालीदास ने कहा- 'शबदधारा स-धारा, सलंबा सरस्वती, पंडिता मंडिता सर्वे, भोज राजो उद्यते।' यानी जब तक राजा भोज रहेंगे। तब तक धारा नगरी में सरस्वती बहेगी। विद्वानों का सम्मान होगा। पर बात भैरोंसिंह शेखावत की। शुक्रवार को सभापति के नाते उनके चार साल पूरे हुए। याद होगा- उन्नीस अगस्त 2002 को उपराष्ट्रपति बने थे। तब भी शेखावत की खूब प्रशंसा हुई। तबके पीएम वाजपेयी ने कहा था- 'यह धरती पुत्र राष्ट्र के माथे का चंदन का तिलक बनने के लिए धरती से उठा है।' अपने मनमोहन तब विपक्ष के नेता थे। वह बोले- 'पचास साल से ज्यादा आपका सार्वजनिक जीवन बुध्दिमता, ज्ञान और अनुभव का प्रतीक है।' पर अब जब शेखावत का इस पद पर एक साल रह गया। तो शेखावत को मनमोहन की प्रशंसा के दो शबदों की जरूरत थी। जो उन्हें नसीब नहीं हुए। मनमोहन के मुखारविंद से प्रशंसा हो जाती। तो राष्ट्रपति पद की अटकलें शुरू होतीं। वैसे अटकलों का दौर तो 'सेंस आफ हाउस' से शुरू हो ही गया। शेखावत के मामले में 'सेंस आफ हाउस' लगा। टीडीपी के लालजन बाशा ने बिना लाग-लपेट कहा- 'यदि आप प्रमोट होकर इस देश के राष्ट्रपति बनें। तो देश की बहुत भलाई होगी।' विक्रम वर्मा बोले- 'सर, रीयल सेंस आफ हाउस सामने आ गया। अब कम से कम यह बात वहां तक कनवे हो जाए।' शेखावत फंस गए। क्या पचौरी को कनवे करने के लिए कहते। सो उन ने कहा- 'नहीं, नहीं कोई कनवे करने की जरूरत नहीं।' सदन में जब यह बात हो रही थी। तो कर्ण सिंह पहली कुर्सी पर सांसें रोक कर बैठे थे। किसने शेखावत के कसीदे नहीं पढ़े। शुरुआत की सुरेश पचौरी ने। उन ने कहा- 'हम आकांक्षी हैं कि अनेक वर्षों तक हमें आपका मार्ग दर्शन मिलता रहे।' पर इस मार्ग दर्शन का मतलब है- शेखावत की पदोन्नति न हो। वह उपराष्ट्रपति बने रहें। उपराष्ट्रपति बने रहेंगे। तभी तो मार्ग दर्शन मिलता रहेगा। यों सुनते हैं- सरकार गदगद है। लाभ के पद वाले संकट से शेखावत ने ही उबारा। शेखावत के दखल से ही तुरत-फुरत जेपीसी का हल निकला। सो पचौरी ने फौरन कर्ज उतार दिया। शेखावत हों या सोमनाथ। कभी प्रश्काल स्थगित नहीं होने देते। पर बात स्तुति की हो। तो सोमनाथ हों या शेखावत। नियम धरे रह जाते हैं। पचौरी ने शुरुआत की। तो सुषमा क्यों पीछे रहती। सुषमा बधाई दे गईं। तो अमर सिंह कैसे पीछे रहते। लगते हाथों सदन में ब्राह्मण और ठाकुरवाद भी चमका। शेखावत को शरद यादव, पीसी अलेंग्जेंडर, फारुक अबदुल्ला, जया बच्चन, तारिक अनवर, बीजे पंडा, राहुल बजाज, विमल जालान, अपने एमएस गिल, तरलोचन सिंह से भी बधाइयां मिलीं। पर जब नजमा हेपतुल्ला अंदर की बात बताने लगीं। तो पवार ने टोकते हुए कहा- 'अंदर की बात मत बताइए। मीडिया बैठा है।' लगते हाथों बताते जाएं। इस स्तुतिगान के आर्कीटेक्ट पवार ही थे। वही पवार, जो शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने के आर्कीटेक्ट भी थे। तभी तो अंदर की बात का जिक्र आते ही पवार ने नजमा को टोका। पर बात फ्यूचर की। मौका मिला तो राष्ट्रपति पद के आर्कीटेक्ट भी पवार ही होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115596784882543660?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115596784882543660/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115596784882543660' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115596784882543660'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115596784882543660'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_18.html' title='तो &apos;सेंस आफ हाउस&apos; शेखावत के पक्ष में'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115587731563082388</id><published>2006-08-17T21:59:00.000-07:00</published><updated>2006-08-17T22:01:55.646-07:00</updated><title type='text'>पदों के लाभ पर कलाम की आत्मा नहीं मानी</title><content type='html'>अपन ने 28 जुलाई को लिखा था- 'परमाणु ईंधन कहीं देश को महंगा न पड़ जाए।' तब मनमोहन सिंह ने संसद में भरोसा दिया था- 'अमेरिकी कानून वादे के मुताबिक न बना। तो हम देखेंगे। हम साझा बयान से एक इंच इधर-उधर नहीं होंगे।' यह बात 26 और 27 जुलाई को थी। वामपंथी पीएम के इस भरोसे से संतुष्ट नहीं थे। उन ने राजग के यशवंत और दिग्विजय के साथ गुप्त मीटिंगे की। कुछ खुल्लमखुल्ली गलबहियां भी दिखी। नटवर के साथ यशवंत, दिग्विजय, अमर सिंह और येचुरी सेंट्रल हॉल में नया गठजोड़ दिखाते रहे। पर होना वही था, जो अपन को शुरु से पता था। भौंकने वाले काटते नहीं, यह अपन ने कई बार बताया। वामपंथी पीएम के 26-27 जुलाई के बयान से संतुष्ट नहीं थे। पर सत्रह अगस्त को उसी बयान से संतुष्ट हो गए। उसी बयान पर इस बार येचुरी इतने खुश हुए। पूछो मत। वामपंथियों ने नौ सवाल पूछे थे। पर गदगद येचुरी बोले- सरदार मनमोहन सिंह ने बारह के जवाब दे दिए। पर यह बात अपने पल्ले नहीं पड़ी। वह तीन सवाल कौन से थे, किसने किए थे। किन सवालों के जवाब थे वे। यह चापलूसी करने वाले येचुरी ही बता पाएंगे। अपन ने येचुरी को भी ध्यान से सुना। मनमोहन को भी। येचुरी कह रहे थे- 'परमाणु ऊर्जा बाकी ऊर्जाओं के मुकाबले सबसे महंगी है। इसलिए अमेरिका ने पिछले तीस सालों में कोई परमाणु ऊर्जा ईकाइ नहीं लगाई। अब फालतू पड़े रिएक्टर भारत को बेचना चाहता है। सो यह सौदा भारत के फायदे का नहीं। अमेरिका के फायदे का है।' येचुरी ने दुनिया भर के आंकड़े दिए। जिनमें बताया गया- 'कौन सी ऊर्जा कितनी महंगी पड़ेगी।' पर मनमोहन सिंह ने येचुरी के आंकड़ों की धाियां उड़ा दी। उन ने कहा- 'परमाणु ऊर्जा सबसे सस्ती है।' इस पर येचुरी खुश हों, तो दाल में जरुर काला है। या तो येचुरी के आंकड़े गलत थे। वह संसद को गुमराह कर रहे थे। या फिर वामपंथियों ने रिचर्ड वाउचर के सामने घुटने टेक दिए। आपको याद होगा। अपन ने पांच अगस्त को लिखा था- 'वामपंथियों के दांत खाने के और, दिखाने के और।' इसी में अपन ने लिखा- 'शुक्रवार (चार अगस्त 2006) को रिचर्ड वाउचर की कोलकाता में बुध्ददेव भट्टाचार्य से गुफ्तगू हुई। तो प्यार की खिचड़ी पक गई।' मतलब साफ था- परमाणु मुद्दे पर वामपंथी आखिरी वक्त पर विपक्ष को दगा देंगे। वही हुआ। गुरुवार को राज्यसभा में परमाणु समझौते पर चौथी बार चर्चा हुई। अपन को समझौते के नतीजे ठीक नहीं दिखते। अमेरिका का मकसद एक नहीं। अनेक है। पहला- भारत पर परमाणु रिएक्टरों का आर्थिक बोझ डालना। दूसरा- ऊर्जा महंगी करके भारत में अराजकता फैलाना। तीसरा- भारत को ईरान से ऊर्जा संबंध तोड़ने का दबाव बनाना। चौथा- भारत को परमाणु ऊर्जा ईंधन देकर पाकिस्तान को दबाव में लाना। पांचवां- भारत के परमाणु कार्यक्रम को बंद करवाना। छठा- भारत के परमाणु शक्ति बनने के सपने को तोड़ना। सातवां- बिना एनपीटी के दस्तखत किए ही भारत को एनपीटी के दायरे में लाना। ये बातें भले ही वामपंथियों को समझ न आती हो। पर आम भारतीय को तो समझ में आती होगी। परमाणु मुद्दे पर अपने राष्ट्रपति भी कम खफा नहीं। इसीलिए अपन ने 12 अगस्त को लिखा था- 'परमाणु बम, लाभ के पद और अबदुल कलाम।' अबदुल कलाम को परमाणु बम का जनक कहा जाता है। सो वह खफा होंगे ही। जब देखेंगे, उनके जीते जी उनकी उम्मीदों पर मनमोहन सिंह ने कैसे पानी फेरा। सुनते हैं अबदुल कलाम सचमुच खफा हैं। राष्ट्रपति पद से मोह भंग हो गया। सिर्फ परमाणु मुद्दा ही नहीं। मौजूदा सरकार ने लाभ के पद वाले मामले में भी कलाम को अपमानित किया। राष्ट्रपति ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए थे। भले ही उन ने साफ-साफ नहीं कहा। पर यह सवाल तो छुपा ही हुआ था- 'दो लोगों के लिए अलग-अलग कानून क्यों हो। जिस जुर्म के लिए जया बच्चन को सजा मिले। उसी जुर्म के लिए सोनिया-सोमनाथ को क्यों नहीं।' यूपीए ने घमंडपूर्ण व्यवहार किया। राष्ट्रपति ने सत्रह दिन तक बिल पर दस्तखत नहीं करके अपने तेवर दिखा दिए। वही तेवर, जिसकी आशंका अपन को शुरु से थी। घमंडी यूपीए की अब चूलें हिल गई। सो सत्रह दिन बाद ही खुद का पास किया बिल खामियों भरा लगने लगा। अब उसी विधि मंत्री ने इस मुद्दे पर जेपीसी का एलान किया। जो बीस दिन पहले अपने बिल को परफेक्ट बता रहे थे। स्वाभाविक है- राष्ट्रपति ने इस्तीफे का इरादा जता दिया होगा। तभी सरकार की सांसें फूली। अक्ल आई, पर देर से। राष्ट्रपति को संतुष्ट करने का फार्मूला तो ठीक। पर राष्ट्रपति को जेपीसी का झुनझुना दिखाकर दस्तखत करवाने के बाद क्या होगा। जेपीसी में बहुमत तो उसी यूपीए का होगा। जैसे मनमोहन ने पहले जाकर कलाम को बताया था- 'संसद का बहुमत मौजूदा बिल के ही पक्ष में था।' क्या गारंटी है, बाद में जाकर कलाम को बताया जाए- जेपीसी भी मौजूदा कानून के पक्ष में है। क्या सीधे-सादे राष्ट्रपति अबदुल कलाम इस राजनीतिक झांसे में आएंगे। अब आने वाले दिनों में यही देखना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115587731563082388?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115587731563082388/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115587731563082388' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115587731563082388'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115587731563082388'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_17.html' title='पदों के लाभ पर कलाम की आत्मा नहीं मानी'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115502440345676873</id><published>2006-08-08T00:49:00.000-07:00</published><updated>2006-08-08T01:06:43.470-07:00</updated><title type='text'>रपट किसी जज की लिखी नहीं लगती</title><content type='html'>पाठक कमेटी की रपट आ गई। साथ में एटीआर भी। यानी रपट पर सरकार ने जो कार्रवाई की। उसका लेखाजोखा भी रख दिया। यूपीए सरकार ने इतिहास बनाया। पंद्रह मिनट में रपट लीक कर दी। बहतर घंटों में एटीआर पेश कर दी। तारीफ करनी पड़ेगी यूपीए सरकार की। नटवर सिंह के तेवर सोमवार को और तीखे दिखे। उन ने सीधा मनमोहन सिंह पर निशाना साध लिया। पर लीक मामले में नटवर का शक संजय बारू पर है। संजय बारू पीएमओ में प्रेस सलाहकार हैं। रपट संजय बारू ने लीक की, या नहीं। अपन नहीं जानते। अपन अगर दासमुंशी की मानें। तो लीक की जांच शुरू हो चुकी। पर रपट की लीक पर विशेषाधिकार हनन बनेगा। ऐसा अपन को नहीं लगता। यों नोटिस तो दोनों सदनों में दिया गया। पर मनमोहन सिंह क्योंकि लोकसभा के मेंबर नहीं। तो असली लड़ाई राज्यसभा में होगी। नटवर भी राज्यसभा के मेंबर ठहरे। नटवर अभी तक तो कांग्रेसी हैं। पर सोमवार को जब आमने-सामने ठनी। तो कांग्रेसियों ने अपने बुजुर्ग नेता को बोलने नहीं दिया। पर नटवर हार नहीं मानने वाले। उन ने कमर कस ली। सोमवार को सदन में डटे तो दिखे ही। बाद में भी डटने का एलान कर दिया। एटीआर के बाद नटवर ने सदन के चेयरमैन शेखावत को चिट्ठी लिखी। उन ने लिखा- 'मैं अपना पक्ष रखना चाहता था। पर कांग्रेस सांसदों ने मुझे बोलने नहीं दिया। मेरे अधिकारों का हनन हुआ। अब मैं मनमोहन सिंह को बोलने नहीं दूंगा।' नटवर ने लड़ाई का फैसला जल्दबाजी में नहीं किया। उन ने 15 दिन पहले सोनिया और पीएम को चिट्ठी लिखी थी। नटवर के गुस्से को अपन ने तब देखा। जब उन ने कहा- 'मैं 75 का हो गया। पांच साल और जी सकता हूं। कल भी मर सकता हूं। पर जितना जीऊंगा, पूरे सम्मान के साथ जीऊंगा। मेरे बदन पर कोई दाग नहीं। लगने भी नहीं दूंगा।' यों नटवर के खिलाफ जिन ने मोर्चा खोला था। अब वही नटवर के साथ खड़े हैं। जब वोल्कर रपट में दलाली का खुलासा हुआ। तो राजग ने नटवर को निशाना बनाया। निशाने पर नटवर और सोनिया दोनों थे। पर तरस आता है उस विपक्ष पर। जो पहले नटवर को घेर रहा था। अब उसके साथ खड़ा है। वोल्कर रपट में खुलासा था- 'भारत की कांग्रेस पार्टी और नटवर सिंह ने सद्दाम हुसैन से तेल लिया। मार्केट में बेचा। उससे मुनाफा कमाया। सद्दाम हुसैन के खाते में कमीशन जमा हुई। जो संयुक्त राष्ट्र की शर्तों के खिलाफ था।' पर कांग्रेस जैसा हमेशा करती रही। इस बार भी वैसा ही किया। पार्टी और सोनिया को बचाने के लिए नटवर की बलि चढ़ा दी। उनसे विदेश मंत्री पद से इस्तीफा ले लिया। तब मीठी गोली दी गई। मनमोहन सिंह ने कहा- 'पाठक कमेटी जल्द रपट दे देगी। तब तक कोई विदेश मंत्री नहीं बनाऊंगा। आप बरी होकर विदेश मंत्री बनेंगे।' ग्यारह नवंबर को कमेटी बनी। तीन महीने का वक्त था। यानी ग्यारह फरवरी को रपट आती। आठ फरवरी को चिदंबरम ने नटवर सिंह को फोन किया। कहा- 'आप प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश हो जाओ। सब ठीक हो जाएगा। जल्द रपट आ जाएगी।' नटवर ने वही किया। पर अगले ही दिन कमेटी की अवधि बढ़ गई। चिदंबरम वही कर रहे थे। जो ऊपर से आदेश था। आदेश साफ था- 'सोनिया और कांग्रेस को बचाने के लिए नटवर को सूली पर चढ़ा दो।' सिर्फ चिदंबरम कहां। आप जस्टिस आरएस पाठक की रपट पढ़ लीजिए। लगेगा ही नहीं- किसी जज की लिखी हुई है। अपन जस्टिस पाठक का इतिहास बता दें। जस्टिस पाठक के पिता अंग्रेजों के करीब थे। उन्हें रायबहादुर की पदवी मिली थी। पर आजादी मिली। तो वे नेहरू के करीब हो लिए। फिर आरएस पाठक सीढ़ी-दर-सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बने। हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत में जज भी। अपन 1984 के दंगों पर रंगनाथ मिश्र की रपट याद दिलाएं। तो आप कहेंगे गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं। पर आप आरएस पाठक की रपट ही देख लें। कदम-कदम पर लगेगा- 'कांग्रेस को बचाने के लिए लिखी गई है रपट।' पूरी रपट में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम नहीं। हालांकि बार-बार कांग्रेस अध्यक्ष का जिक्र आया। नटवर को सोनिया ने ही इराक भेजा था। नटवर के हाथ ही चिट्ठी भेजी थी। रपट में नटवर की तीनों चिट्ठियां मौजूद। पर सोनिया की चिट्ठी गायब। सोमवार को जब रपट रखी गई। तो नटवर ने सदन में चिल्लाकर कहा- 'सद्दाम हुसैन को चिट्ठी किसने लिखी थी। उस चिट्ठी का पाठक कमेटी की रिपोर्ट में जिक्र क्यों नहीं है।' पर बात जस्टिस पाठक की। वह लिखते हैं- 'के. नटवर सिंह और जगत सिंह ने इराकी अधिकारियों पर ऐसा प्रभाव डाला कि वे दोनों कांग्रेस के प्रतिनिधि हैं। जांच कमेटी को लेनदेनों में कांग्रेस पार्टी को जोड़ने के लिए कोई सबूत नहीं मिला। कमेटी को जो दस्तावेज दिए गए। उससे लगता है- कांग्रेस पार्टी ने कोई गलत काम नहीं किया।' पर उस चिट्ठी का क्या होगा। जो सोनिया गांधी ने लिखी थी। कमेटी तो बनी थी- कांग्रेस और नटवर की जांच करने के लिए। पर सरकार ने पाठक को वही मसाला दिया। जो नटवर के खिलाफ जाए। जो मसाला सोनिया के खिलाफ जाता। वह दिया ही नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115502440345676873?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115502440345676873/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115502440345676873' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115502440345676873'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115502440345676873'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_08.html' title='रपट किसी जज की लिखी नहीं लगती'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115476435146723688</id><published>2006-08-05T00:49:00.000-07:00</published><updated>2006-08-05T00:52:31.483-07:00</updated><title type='text'>वामपंथियों के दांत खाने के और, दिखाने के और</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अजय सेतिया&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;गुरुदास दासगुप्त ने बाबा रामदेव का जुमला बोला। तो वृंदा कारत को बहुत गुस्सा आया होगा। बाबा रामदेव ने युवाओं को कहा- 'पेप्सी या कोक की एक बोतल टायलेट में डालकर देखिए। टायलेट हार्पिक्स से बढ़िया साफ होता है। कोक और पेप्सी आपके शरीर में जाकर आपकी हड्डियों को भी ऐसे ही गलाता है।' बाबा रामदेव का यही जुमला दासगुप्त ने लोकसभा में दोहराया। पर वामपंथियों के दोगलेपन का जवाब नहीं। कोक-पेप्सी ने अपना पहला प्लांट बंगाल-केरल में ही लगाया था। दिल्ली में कोक और पेप्सी की मुखालफत करेंगे। बंगाल-केरल में उनके प्लांटों से राजनीतिक चुंगी उगाहेंगे। वामपंथियों के दिल्ली और कोलकाता के तेवर हमेशा अलग-अलग रहे। अब देखो- दिल्ली में अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोल लिया। पर शुक्रवार को रिचर्ड वाउचर की कोलकाता में बुध्ददेव भट्टाचार्य से गुफ्तगू हुई। तो प्यार की खिचड़ी पक गई। इजराइल ने लेबनान पर हमला किया। तो दिल्ली में वामपंथियों ने हथियारों की खरीद-फरोख्त बंद करने की मांग की। पर बंगाल की वाम सरकार का इजराइल से कृषि समझौता जारी है। अपन को तो पहले से ही शक था। वामपंथी परमाणु समझौते के मुद्दे पर कदम पीछे हटा लेंगे। शुक्रवार को अपन को साफ दिखने लगा। जब रिचर्ड वाउचर-बुध्ददेव भट्टाचार्य की मुलाकात हुई। उसके फौरन बाद दिल्ली में चारों वामदलों की मीटिंग हुई। मीटिंग से निकल कर अबनी राय बहुत खफा दिखे। अपन ने पूछा। तो बोले- 'वामपंथी भले ही सरकार को पांच साल घसीट लें। पर पांच साल पूरे हुए। तो वामपंथियों की साख नहीं बचेगी। सो लोकसभा जितनी जल्दी भंग हो। उतना अच्छा।' वामपंथियों में इतना साफ दिल इंसान अपन को और नहीं दिखता। उनके जो दिल में था। उनने साफगोई से कहा। पर बात साफ हो गई। इस मीटिंग में जरूर फैसला हुआ होगा- उस हद तक नहीं जाना। जिसमें सरकार को खतरा हो। यों कहने को सीताराम येचुरी ने कहा- 'देश के लिए भाजपा के साथ जाने में हर्ज नहीं। हम संसद की आम राय की बात कर रहे हैं। जिसमें भाजपा भी हिस्सा है।' पर मनमोहन-सोनिया ने वामदलों को दो-टूक शबदों में कह दिया। भाजपा या सरकार एक चुन लो। भाजपा के साथ मिलकर परमाणु समझौते पर प्रस्ताव लाओगे। तो चुनावों के लिए तैयार हो जाओ। वैसे नफा-नुकसान तो वामपंथी सोचेंगे। पर कोई अपन से पूछे। तो परमाणु मुद्दे पर सरकार गिरी। तो वामपंथी फायदे में रहेंगे। वामपंथियों पर हमेशा देशद्रोह का आरोप लगता रहा। आजादी से पहले वे अंग्रेजों के साथ थे। सुभाष चंद्र बोस को तोजो का कुता कहते थे। यों तो वामपंथी इसलिए हमेशा अमेरिका के खिलाफ रहे। क्योंकि दशकों तक कम्युनिस्ट सोवियत संघ का अमेरिका से शीत युध्द चला। भारत पर जब कम्युनिस्ट चीन ने हमला किया। तो भारत के कम्युनिस्टों ने भारत की ही गलती निकाली। जैसे दुनिया भर में मुसलमान पहले मुसलमान। भारतीय, पाकिस्तानी, लेबनानी या अमेरिकी बाद में। उसी तरह कम्युनिस्ट भी पहले चीनी या सोवियत संघी होते हैं। भारतीय, पाकिस्तानी या इजराइली बाद में। इजराइल की बात चली। तो बताते जाएं। इजराइल का एक शहर है हाइफा। हाइफा में कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा है। हाइफा लेबनान से लगता इलाका है। हाइफा की एक और खासियत है- मुसलमानों की आबादी अच्छीखासी होना। छह साल पहले जब इजराइल ने लेबनान के कुछ इलाके पर कबजा किया। तो हाइफा के कम्युनिस्ट मेयर ने इजराइल के पीएम पर दबाब डाला। नतीजतन इजराइल ने लेबनानी इलाका छोड़ दिया। नतीजा निकला- कम्युनिस्ट मेयर को हाइफा के 91 फीसदी मुसलमानों का वोट मिला। पर अब जब इजराइल के एक फौजी का हिजबुल्ला आतंकियों ने अपहरण किया। तो नए सिरे से जंग शुरू हुई। अब हिजबुल्ला आतंकी जितने राकेट छोड़ रहे हैं। सब हाइफा पर गिर रहे हैं। सो कम्युनिस्ट मेयर को अब जाकर अक्ल आई। सो अब वह तब तक हमले के पक्ष में खड़ा है। जब तक लेबनान में हिजबुल्ला का खात्मा नहीं होता। हाइफा के मेयर ने भारत के कम्युनिस्टों को भी सदबुध्दि का संदेश भेजा। मेयर ने कहा- 'जहां रहते हो, वहां के हित सोचिए। इजराइल के खिलाफ लामबंदी छोड़िए।' लगता है- भारत के कम्युनिस्ट कुछ-कुछ समझने लगे। इसीलिए पुराने अमेरिका विरोध के बावजूद सीताराम येचुरी का बयान देशभक्ति वाला है। पर यह देशभक्ति कितने दिन। अपन ने शुक्रवार की वामदलों की मीटिंग के संकेत बता दिए। शुक्रवार को रिचर्ड वाउचर और बुध्ददेव भट्टाचार्य की मुलाकात बता दी। नतीजा देख लेना। परमाणु मुद्दे पर प्रस्ताव के लिए भाजपा की तरह नहीं अड़ेंगे कम्युनिस्ट। हाथी के दांत खाने के और होते हैं। दिखाने के और। यह सोनिया भी जानती हैं। हाथी सिर्फ भारत में नहीं होते। इटली समेत पूरी दुनिया में होते हैं। सो सोनिया और मनमोहन भी बेफिक्र है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115476435146723688?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115476435146723688/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115476435146723688' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115476435146723688'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115476435146723688'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_05.html' title='वामपंथियों के दांत खाने के और, दिखाने के और'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115467304327089148</id><published>2006-08-03T23:23:00.000-07:00</published><updated>2006-08-03T23:30:43.283-07:00</updated><title type='text'>राजनीतिक उथल-पुथल में राजस्थानियों का दबदबा</title><content type='html'>इधर जसवंत सिंह का खेल खत्म नहीं हुआ। उधर नटवर सिंह का खेल शुरू हो गया। दोनों की राजनीतिक दुश्मनी कौन नहीं जानता। दुश्मनी शबद का इस्तेमाल अपन ने सोच-समझ कर किया। राजनीति में दुश्मनी नहीं होती। दुश्मन कब दोस्त बन जाएं। दोस्त कब दुश्मन बन जाए। राजनीति में कुछ कहा नहीं जा सकता। पर इन दोनों को जैसा अपन ने देखा-समझा। दोनों का छतीस का आंकड़ा रहा। दोनों में ऐसा गुण भी नहीं देखा। जो एक-दूसरे को पचा लें। इसकी वजह भी अपन बताते जाएं। राजनीति में तो दुश्मन दोस्त बन सकता है। पर कूटनीति में ऐसा नहीं होता। भले ही दोनों को कूटनीति न आती हो। पर दोनों समझते हैं खुद को कूटनीति के बादशाह। नटवर खुद को हेनरी किसिंजर समझते हैं। तो जसवंत खुद को एलेग्जी कोसीगिन। पर दोनों अब बुरी तरह फंस चुके। जसवंत लेखक बनकर फंसे। तो नटवर दलाल बनकर। कहते हैं ना- जिसका काम उसी को साजे। दूसरा करे तो........... लागे। जसवंत के पास मनमोहन के खिलाफ मारक हथियार था। पर वह कूटनीतिक भाषा से प्रहार करते रहे। मनमोहन भले ही राजनीति और कूटनीति दोनों नहीं जानते। पर खुद पर प्रहार होता दिखा। तो कभी गुस्सा में न आने वाली छवि बदल डाली। वैसे आदमी को गुस्सा कब आता है। यह समझना मुश्किल नहीं। वह मनमोहन ही थे। जो बार-बार नरसिंह राव को परमाणु परीक्षण से रोक रहे थे। पर नरसिंह राव नहीं मान रहे थे। फिर परीक्षण की बात अचानक अमेरिका को लीक हो जाती है। अमेरिकी दबाव पड़ता है। और नरसिंह राव परीक्षण नहीं कर पाते। अब समझने में क्या रह जाता है। पर जसवंत राज्यसभा में दो घंटे तक जलेबी बनाते रहे। गुरुवार को सीधी बात विजय कुमार मल्होत्रा ने कही। पर परमाणु मुद्दे पर इतनी गरमी आई क्यों। जरा यह भी समझ लें। अमेरिका ने हू-ब-हू वैसा परमाणु समझौता करवा लिया। जैसा जसवंत की ओर से अब छापी गई चिट्ठी में जिक्र है। पर अमेरिका को शक था- नटवर इसे सिरे नहीं चढ़ने देंगे। सो जान-बूझकर वोल्कर कमेटी की रिपोर्ट लीक की गई। ताकि नटवर को दूध से मक्खी की तरह निकाला जाए। शुरू में मनमोहन निकालने को तैयार नहीं थे। फिर इस्तीफे का दबाव भी बनाया। और पाठक कमेटी की जांच भी बिठाई। यह किसके दबाव में हुआ? क्या सिर्फ विपक्ष के दबाव में हुआ था? अब जब भाजपा, माकपा मिलकर परमाणु समझौते पर सरकार को घेर रहे थे। सरकार से सदन में ऐसा वादा चाहते थे। ताकि सरकार 18 जुलाई के साझा बयान से जरा भी इधर-उधर न हो। अमेरिकी दबाव में भारत का परमाणु कार्यक्रम बंद न हो। तो ठीक ऐसे समय पर पाठक कमेटी की रिपोर्ट आ जाती है। नटवर ने अगर माकपा-भाजपा के लिए प्रस्ताव का प्रारूप तैयार न किया होता। तो शायद अभी पाठक कमेटी की रपट न आती। सरकार की सांसें फूली हुई हैं। कभी मनमोहन भाकपा को सरकार गिरने का डर दिखाते हैं। कभी सोनिया माकपा को लोकसभा भंग कराने की धमकी देती हैं। पर अगर परमाणु का फच्चर फंसा ही रहा। अगर राष्ट्रपति ने लाभ के पद वाले बिल पर दस्तखत न किए। तो भले ही राजस्थान के जसवंत-नटवर अपने ही बुने जाल में फंसे हों। राजस्थान के भैरोंसिंह शेखावत की लाटरी खुल सकती है। अपन ने गुरुवार को पता किया। तो पता चला- एपीजे अबदुल कलाम पास हुए बिल को पढ़ रहे हैं। पर अपना माथा ठनका। बिल तो हू-ब-हू वही था। जो उन ने 30 मई को लौटाया था। फिर दुबारा क्यों पढ़ रहे होंगे। अबदुल कलाम के राष्ट्रपति भवन में 11 महीने बाकी रह गए। महीना भर बिल न लौटाएं। तो बाकी बचेंगे सिर्फ दस महीने। सितंबर में अगर साफ कह दें- 'इस्तीफा दे दूंगा, पर बिल पर दस्तखत नहीं करूंगा।' तो अबदुल कलाम औहदों का लाभ उठा रहे राजनीतिज्ञों के सामने बहुत बड़े हो जाएंगे। फिर अचानक इस्तीफा दे भी दें। तो अबदुल कलाम का कद बहुत बढ़ जाएगा। इसमें अगर लाटरी खुलेगी। तो अपने शेखावत की। जो घर बैठे राष्ट्रपति बन जाएंगे। एक बार राष्ट्रपति बन गए। तो चुनाव जीतना मुश्किल नहीं होगा। किस्मत कब साथ दे जाए। कौन जाने। अपन 2003-04 का श्री मार्तंड पंचांगम देख रहे थे। यह पंचांग चार साल पहले लिखा गया। पंचांग के तीसवें पेज पर लिखा है- 'सितंबर 2006 के आसपास शेखावत का भारत के सर्वोच्च पद पर होने का योग है।' वैसे पिछले दिनों लक्ष्मण दास मदान ने भी ऐसी भविष्यवाणी की। पर मदान की कई भविष्यवाणियां गलत भी हो चुकीं। सो अपन उस पर कोई भरोसा नहीं करते। भरोसा तो अपन तब तक श्री मार्तंड पंचांगम पर भी नहीं करेंगे। जब तक यह भविष्यवाणी सही साबित न हो। यह पंचांगम चार साल पहले लिखा गया था। उसमें लिखा गया था- 'भाजपा की विकल्प बनेगी कांग्रेस। पर सरकार गठबंधन की ही बनेगी। राजग बना रहेगा। पर कमजोर हो जाएगा।'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115467304327089148?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115467304327089148/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115467304327089148' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115467304327089148'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115467304327089148'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post_03.html' title='राजनीतिक उथल-पुथल में राजस्थानियों का दबदबा'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115449788912348866</id><published>2006-08-01T22:50:00.000-07:00</published><updated>2006-08-01T23:01:04.223-07:00</updated><title type='text'>नाम नहीं पता, तो क्या? जासूस तो था</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अजय सेतिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चर्चिल भारत की आजादी के खिलाफ थे। सो अपन चर्चिल के समर्थक नहीं हो सकते। पर चर्चिल ने आजादी की मुखालफत करते समय जो कहा। उसे आज याद करने का वक्त आ गया। चर्चिल ने कहा था- 'सता बेईमानों, गुंडों, और जूतमपैजारियों के हाथों में चली जाएगी। आक्सीजन पर भले ही टेक्स न लगे। पर पानी की एक बोतल और रोटी का एक टुकड़ा भी टेक्स से मुक्त नहीं होगा। सभी भारतीय नेता निम् चरित्र और बौध्दिक स्तर के होंगे। वे सता के लिए आपस में लड़ेंगे। नतीजतन देश राजनीतिक झगड़े में विलुप्त हो जाएगा।' अब देख लो क्या हो रहा है। साठ साल पहले चर्चिल की कही बात सही हुई, या नहीं। अपन ने 31 जुलाई और पहली अगस्त को संसद में जो कुछ देखा। उससे रोंगटे खड़े होने चाहिए। इन दोनों दिन संसद में इजराइल के खिलाफ प्रस्ताव पास हुआ। आतंकवादी लेबनान से आए। पर निंदा हो रही है इजराइल की। यानी अपन आतंकवादियों के समर्थक हो गए। प्रस्ताव आतंकवाद के खिलाफ पास होना चाहिए था। साथ में इजराइल की इसलिए निंदा होती। क्योंकि उसने नागरिक ठिकानों पर हमला किया। पर लेबनान की निंदा क्यों न हो। लेबनान ने क्यों प्रश्रय दिया हुआ है हिजबुल्ला आतंकियों को। जैसे पाकिस्तान ने आतंकियों को प्रश्रय दिया। हू-ब-हू वैसे ही लेबनान ने किया। पर छोड़ दो इस प्रस्ताव की बात। पिछले महीने मुंबई में बम धमाके हुए। दो सौ से ज्यादा लोग मारे गए। देश भर में गिरफ्तारियां हुईं। तो मंगलवार को सीपीपी की मीटिंग में सोनिया ने क्या कहा। जरा वह भी सुन लीजिए। बोलीं- 'कोई एक समुदाय (मुस्लिम) खुद को घिरा न समझे। या यह न समझे, शक की सुई उस पर है।' अपन जानते हैं, सोनिया ने ऐसा क्यों कहा। अपन दो दिन से देख रहे थे। मुस्लिम नेता संसद के गलियारों में गिरफ्तारियों की मुखालफत कर रहे थे। कह रहे थे- 'मुंबई बम धमाकों के बाद मुस्लिम सुरक्षित नहीं। जब चाहे पुलिस वाले उठा ले जाते हैं।' पर अपन सुन रहे थे मुंबई के एक पुलिस अधिकारी का बयान। जिसने बताया- 'गिरफ्तार लोगों से सबूत मिल चुके। अनेकों के पास सिमी का लिटरेचर मिला।' मुंबई बम धमाकों की एक और घटना याद कराएं। जैसे वाजपेयी ने संसद पर हमले के बाद कहा था- 'अब आर-पार होगा।' हू-ब-हू वैसा ही मनमोहन ने कहा। जब उन ने कहा- 'जब आतंकवाद बंद न हो। तो शांति वार्ता का क्या फायदा।' पर मनमोहन सेंटपीटर्सबर्ग से लौटे। तो पाक के खिलाफ बोलना बंद कर दिया। अमेरिका ने जो कहा, मनमोहन ने वही किया। फिर सोमवार को अपन ने देखा। अपने विदेश सचिव श्याम सरन ने ढाका में शांति वार्ता शुरू कर दी। जब दिल्ली में मनमोहन सिंह और श्याम सरन गरज रहे थे। तभी इस्लामाबाद से खबर आ रही थी- 'ढाका में होगी बातचीत।' अब सार्क में मंत्री स्तरीय बातचीत भी होगी। तब तक शायद विदेश मंत्री बन जाए। बात विदेश मंत्री की चली। तो मंगलवार का राज्यसभा का किस्सा सुन लो। वाजपेयी सरकार में विदेश मंत्री रहे जसवंत कटघरे में थे। जसवंत ने अपनी किताब में एक खुलासा क्या किया। मुसीबत मोल ले ली। चर्चिल ने सही कहा था। नेता जूतमपैजार पर उतर आएंगे। नरसिंह राव परमाणु विस्फोट क्यों नहीं कर पाए। मनमोहन इस गहराई में नहीं जा रहे। उस खुलासे की जांच कराने को तैयार नहीं। जो सिर्फ जसवंत सिंह ने नहीं किया। अलबता तब के इंटेलीजेंस प्रमुख केकी दारूवाला ने भी किया है। दोनों का कहना है- 'राव के शासनकाल में उच्च स्तर पर अमेरिकी जासूस मौजूद था।' जसवंत की ओर से सौंपी गई चिट्ठी को सबूत न मानिए। पर केकी दारूवाला ने तो सबूत दे दिया। मनमोहन ने जसवंत की चिट्ठी पर जैसे सवाल उठाए। वैसे सवाल कोई पीएम स्तर की हस्ती नहीं उठाती। यही बात मंगलवार को जसवंत ने कही। उन ने कहा- 'मुझे हैरानी हुई। एक पीएम कह रहा है- चिट्ठी किसी लेटर पैड पर नहीं। चिट्ठी पर दस्तखत नहीं। कोई पूछे, गुप्तचर चिट्ठियां कभी लैटर पैड पर होती हैं? उस पर कभी दस्तखत होते हैं?' अपन जसवंत सिंह की पैरवी नहीं करते। जासूस का नाम नहीं पता था। तो पहले दिन ही कहते- 'मेरे पास अमेरिकी राजदूत हैरी बर्न्स की अमेरिकी सुरक्षा प्रमुख टीडबल्यू ग्राह्म के नाम लिखी चिट्ठी है। जो जांच के लिए पीएम को सौंप दूंगा।' पर वह चंडूखाने के बयानों से गुमराह करते रहे। पर जसवंत के चंडूखाने से जासूसी कांड तो खत्म नहीं होता। अपन को हैरानी नेताओं के जूतमपैजार पर नहीं। अपन को हैरानी इस बात की- देशद्रोह पर परदा डालने में मीडिया भी शामिल हो गया। सवाल जासूस के नाम का नहीं। सवाल यह है- जासूसी हुई या नहीं। जासूसी नहीं हुई होती। तो राव काल में परमाणु परीक्षण हो गया होता। जसवंत ने एक और पते की बात कही। उसे नजरअंदाज मत करिए। उन ने कहा- 'मनमोहन परमाणु परीक्षण के खिलाफ थे।' मनमोहन इसी पर भड़के। उन ने कहा- 'मुद्दे से भटकिए नहीं। आप तो जासूस का नाम बताइए।' मनमोहन के अमेरिका से रिश्ते कौन नहीं जानता। जैसे ही जसवंत उस मुद्दे पर आए। मनमोहन ने कहा- 'मुद्दे से भटकिए नहीं।' पर असली मुद्दा तो वही है। अमेरिका ने मनमोहन के रहते ही वह हासिल किया। जो और किसी पीएम से हासिल नहीं कर पाया। तो यह लिख कर रख लीजिए। जब तक मनमोहन पीएम रहेंगे। अमेरिकी जासूस का पता नहीं चलेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115449788912348866?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115449788912348866/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115449788912348866' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115449788912348866'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115449788912348866'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/08/blog-post.html' title='नाम नहीं पता, तो क्या? जासूस तो था'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115441420564245447</id><published>2006-07-31T23:35:00.000-07:00</published><updated>2006-07-31T23:36:45.653-07:00</updated><title type='text'>तो आतंकवाद की समर्थक हो गई अपनी लोकसभा</title><content type='html'>इजराइल के हमले पर वामपंथियों ने वही करवाया। जो सोचकर आए थे। सोचकर सिर्फ वामपंथी सांसद ही नहीं आए थे। लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी भी सोचकर आए थे। जरूर चैंबर में वामपंथी खिचड़ी पकी होगी। इसीलिए जीरो आवर में इजराइल पर चर्चा हुई। अपन के पास चैंबर में पकी खिचड़ी के सबूत हैं। भाजपा के 138 सांसद। पर सोमनाथ ने सिर्फ मल्होत्रा को बोलने दिया। सीपीएम के 43 सांसद। पर तीन लोग बोले- वासुदेव आचार्य, मोहम्मद सलीम और रूपचंद पाल। भाकपा के गुरुदास दासगुप्त और आरएसपी के जोचीन बक्सला भी। बकौल सीताराम येचुरी वामपंथियों के दामाद राज बबर भी बोले। सनद रहे, सो बताते जाएं। नादिरा के पिता सााद जहीर पाक की कम्युनिस्ट पार्टी के पहले महासचिव थे। सााद जहीर को पाक में फांसी की सजा हुई थी। जवाहरलाल नेहरू के दखल से फांसी उम्र कैद में बदली। फिर सााद पेरोल पर रिहा हुए। नेहरू के दखल से भारत आए। तो मुड़कर पाक नहीं गए। सो वामपंथियों के दामाद ही हुए राज बबर। अगर अपन कहें- वामपंथियों ने सोमवार को लोकसभा को बुलडोज कर दिया। तो गलत नहीं होगा। भाजपाई-शिवसेनिक भी सदबुध्दि खो बैठे। अपन तारीफ करेंगे एक भाजपाई सांसद खरबला स्वेन की। पूरी लोकसभा में सिर्फ एक सांसद निकला। जिसने हिजबुल्ला का सवाल उठाया। लेबनान का आतंकी संगठन हिजबुल्ला दो इजराइली सैनिकों का अपहरण न करता। तो इजराइल भी लेबनान पर हमला न करता। अपन ने तो पहले दिन ही इजराइल की तारीफ की थी। जब अपन ने 16 जुलाई को लिखा- 'भारत सीखे इजराल से।' फिर अपन ने 20 जुलाई को लिखा- 'इजराइल से सीखने की हिम्मत कहां।' आतंकवाद को कुचलने के लिए हिम्मत चाहिए। यह हिम्मत इजराइल ने दिखाई। भारत कभी यह हिम्मत नहीं दिखा सका। इजराइल ने आतंकवादियों को मांद में घुसकर मारा। भारत दुनिया के सामने सबूत देता रहा। पीओके में चल रहे आतंकी ट्रेनिंग कैंपों के फोटू दिखाता रहा। पर इंदिरा से लेकर वाजपेयी तक किसी ने ऐसी हिम्मत नहीं दिखाई। किसी की हिम्मत नहीं हुई- भारत में आतंकवाद फैलाने वालों की जड़ पर हमला करे। पाक में घुसकर आतंकी शिविर ढहाए जाएं। पर जब इजराइल ने ऐसा लेबनान में किया। तो देश की लोकसभा ने उसकी तारीफ नहीं की। अलबता निंदा प्रस्ताव पास किया। आम नागरिकों पर हमले के लिए इजराइल की निंदा हो। तो अपन को कोई एतराज नहीं। पर इस निंदा प्रस्ताव में हिजबुल्ला का जिक्र तक नहीं। इजराइली सैनिकों के अपहरण का जिक्र तक नहीं। तो क्या मतलब निकला प्रस्ताव का। प्रस्ताव का मतलब साफ है- भारतीय संसद इजराइली सैनिकों के अपहरण का समर्थन करती है। यानी हिजबुल्ला की आतंकी कार्रवाई का समर्थन करती है। यों जब बांग्लादेशी बीएसएफ के जवानों का अपहरण कर ले गए थे। तो भारत ने इजराइल जैसी हिम्मत नहीं दिखाई। बीएसएफ जवानों की लाशों को जानवरों की तरह लौटाया था। तब भी भारत सरकार का खून नहीं खौला। अब तो लोकसभा ने ऐसा प्रस्ताव ही पास कर दिया। तो अपने हाथ हमेशा के लिए कट गए। अब पाकिस्तानी आतंकवादी अपने जवानों का अपहरण कर ले जाएं। या बांग्लादेशी। अपन किसी पर हमला नहीं करेंगे। अपन को वामपंथियों से तो उम्मीद ही नहीं थी। सोचते ही नहीं थे- वे प्रस्ताव में हिजबुल्ला के खिलाफ कुछ लिखेंगे। सरकार के कर्णधारों ने तो अब सोचना छोड़ दिया। वे उसी मक्खी पर मक्खी मारने में लग चुके। जो वामपंथी कहें। पर भाजपाइयों-शिवसेनिकों की बुध्दि को भी जंग लग गई। अमेरिका ने इराक पर हमला किया था। तो वाजपेयी एक शबद पर अड़ गए थे। हिंदी में निंदा शबद जाने दिया। पर अंग्रेजी में 'कंडेम' शबद नहीं लिखने दिया। 'कंडेम' की जगह 'डिप्लोर' लिखा गया। ताकि अमेरिका उतना नाराज न हो। अमेरिका के मामले में महबूबा मुफ्ती ने पते की बात कही। महबूबा ने कहा- 'अमेरिका जब इराक पर हमला करता है। तो हम उसके खिलाफ प्रस्ताव पास करते हैं। अमेरिका की शह पर इजराइल जब लेबनान पर हमला करता है। तो हम निंदा प्रस्ताव पास करते हैं। पर उसके बाद हम उसी अमेरिका से समझौता करते हैं।' सदन में बहस चली। तो अमेरिका से परमाणु समझौते पर भी सवाल उठे। लगते हाथों बात अमेरिका की। जो भारत को पाक के खिलाफ कार्रवाई के लिए रोकता है। पर जब इजराइल लेबनान पर हमला करता है। तो उसकी पीठ थपथपाता है। पर बात अमेरिका की नहीं। बात भारत की लोकसभा की। जिसने सोमवार को इजराइल की निंदा की। पर हिजबुल्ला आतंकियों के बारे में चुप्पी साध समर्थन किया। इजराइल का विरोध इसलिए। ताकि भारत के मुस्लिमों का वोट मिले। अपने राजनीतिबाज देश के मुसलमानों को भारतीय बनने ही नहीं देते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115441420564245447?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115441420564245447/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115441420564245447' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115441420564245447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115441420564245447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/07/blog-post_31.html' title='तो आतंकवाद की समर्थक हो गई अपनी लोकसभा'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115294352415952472</id><published>2006-07-14T22:57:00.000-07:00</published><updated>2006-07-14T23:07:48.616-07:00</updated><title type='text'>शुरू हुआ आतंकवाद का सांप्रदायीकरण</title><content type='html'>&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;अजय सेतिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;इंडिया गेट से&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीतिज्ञ लाशों की राजनीति से भी बाज नहीं आते। मुलायम सिंह यादव ने ऐसे मौके पर सिमी का साथ दिया। जब मुंबई धमाकों पर सारे देश का शक सिमी पर है। तो मुलायम ने सिमी को क्लीन चिट दे दी। पीएम मनमोहन सिंह ने आवाम के मूड को पहचाना। न चाहते हुए भी पाक से शांति वार्ता रोक दी। शुक्रवार को पीएम ने मुंबई में वही बयान दिया। जो अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद पर हमले के बाद दिया था। वाजपेयी ने कहा था- 'आतंकवाद और शांति वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते।' शुक्रवार को यही बयान मनमोहन सिंह का आया। अभिषेक मनु को वाजपेयी का वह बयान याद नहीं आया। पर आर-पार वाला बयान याद रहा। बोले- 'ये खाली शबद थे, अपनी छवि बनाने के लिए।' वाजपेयी के बारे में अभिषेक की यह टिप्पणी। और कुछ नहीं। छोटा मुंह, बड़ी बात ही है। कहां वाजपेयी, कहां सिंघवी। वाजपेयी की रणनीति छोटी नहीं थी। उन ने कूटनीतिक आर-पार करके दिखाया। पाक के उसी नेता मुशर्रफ से कहलवाया- 'पाक की सर जमीं से आतंकवाद नहीं पनपने देंगे।' जिस मुशर्रफ ने कारगिल की साजिश रची थी। मौजूदा सरकार मुशर्रफ को छह जनवरी 2004 वाला बयान याद कराती रहती। अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाती रहती। तो यह आतंकवाद के लिए आर-पार की लड़ाई हो जाती। पर आतंकवाद की फिक्र किसे। राजनीति से फुर्सत मिले। तो देश की फिक्र हो। मनमोहन जब पहली बार वाशिंगटन में मुशर्रफ से मिले। तो छह जनवरी 2004 की घटना को गोल ही कर गए। बहुत बाद में छह जनवरी की एतिहासिकता समझ आई। अब जब मुंबई में बम फटे। तो मनमोहन ने मुशर्रफ को वही बयान याद कराया। मनमोहन ने आतंकवाद पर राजनीति नहीं की। कूटनीति का यही तकाजा था। जो शुक्रवार को मनमोहन ने अपनाया। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी राजनीति नहीं की। वह धमाकों के कुछ घंटे बाद ही मुंबई पहुंचे। तो राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ नहीं बोले। उन ने पाकिस्तान को चेतावनी दी। आडवाणी गृहमंत्री रह चुके। सो धमाकों के मूल को समझने में मुश्किल नहीं हुई। पर अपनी खुफिया एजेंसियो को तो लकवा मार गया। पीएम ने चौथे दिन जाकर पाक को चेतावनी दी। इसे आडवाणी की दूरदर्शिता न कहें। तो क्या कहें। पर सुनते हैं- कई भाजपाइयों को भी आडवाणी का वह रुख नहीं जंचा। जो उन ने मुंबई में सरकार को नहीं कोसा। पर अपन मानते हैं- वह प्रहार का मौका नहीं था। खुफिया तंत्र फेल हुआ। तो उसमें राजनीतिक विफलता नहीं। न मनमोहन सिंह की, न विलासराव देशमुख की। सो राजनीतिक तलवारें खींचने का मतलब नहीं। यों ऐसे मौकों पर भी गैर जिम्मेदार लोगों की कमी नहीं। जैसे मुंबई के पुलिस प्रमुख पीएस पसरीचा ने अजीब-ओ-गरीब बयान दिया। बोले- 'बम धमाकों के पीछे राजनीतिज्ञों का हाथ है।' शुक्रवार को पसरीचा के खिलाफ विधानसभा में मामला उठा। पर गैर जिम्मेदार राजनीतिज्ञ भी कम नहीं। मुलायम सिंह को देखिए। देश की कोई फिक्र नहीं। मुस्लिम वोटों के लिए उस सिमी की पक्षदारी पर उतर आए। जिसका लोकतंत्र में कोई भरोसा नहीं। सेक्युलरिज्म में कोई भरोसा नहीं। जो खुले आम ओसामा बिन लादेन की समर्थक है। मुंबई बम धमाकों के बाद जिस सिमी पर शक की सुई है। उस सिमी की तरफदारी पर उतर आए मुलायम। अपन सिमी का इतिहास याद करा दें। सिमी ने छह साल पहले कानपुर में जलसा किया। जलसे में अफगानिस्तान से दो तालिबान आए थे। यह बात न्यूयार्क पर हुए आतंकी हमले से पहले की है। जलसे में ओसामा बिन लादेन की तारीफ हुई। जलसे में एक गाना गया गया- 'इस्लाम का गाजी कुफ्र शिकन, मेरा शेर ओसामा बिन लादेन।' इस जलसे में देश के खिलाफ जंग-ए-एलान हुआ। कुछ दिनों बाद ही कानपुर में दंगे हो गए। दंगों के मुख्य आरोपी थे- सिमी प्रमुख मोहम्मद आमिर। इस घटना के बाद यूपी सरकार भी जागी। केंद्र की राजग सरकार भी जागी। सताईस सितंबर 2001 को सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया। सिमी के दफ्तर सील कर दिए गए। पर सिमी के नेता अंडरग्राउंड हो गए। सिमी ने तबसे अपना दफ्तर मुंबई शिफ्ट कर लिया। मोहम्मद आमिर भी इस दौरान मुंबई में रहा। यूपी में मुलायम की सरकार बन गई। मुसलमान बसपा की तरफ खिसकने लगे। तो मुलायम ने पेंतरा चला। पच्चीस अप्रैल को आमिर का आत्म समर्पण करवा दिया। मई और जून में लखनऊ का गृह मंत्रालय एक काम में जुटा रहा। काम था- मोहम्मद आमिर को रिहा करवाने की उधेड़-बुन। सुनते हैं- मुलायम सरकार ने सिमी के सोलह वर्करों की रिहाई के आदेश दिए हैं। जिनमें सिमी प्रमुख मोहम्मद आमिर भी हैं। बाला साहब ठाकरे ने सही कहा- 'जब वोटों की ऐसी ओछी राजनीति होगी। तो आतंकवाद कैसे खत्म होगा।' फिर जब नरेंद्र मोदी मुंबई जाएं। तो किसी को एतराज क्यों&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115294352415952472?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115294352415952472/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115294352415952472' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115294352415952472'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115294352415952472'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/07/blog-post_14.html' title='शुरू हुआ आतंकवाद का सांप्रदायीकरण'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115175519821782684</id><published>2006-07-01T04:57:00.000-07:00</published><updated>2006-07-01T04:59:58.226-07:00</updated><title type='text'>वीपी सिंह की किताब मार्केट में आई क्यों नहीं</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अजय सेतिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;इंडिया गेट से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी अखबारों का भी जवाब नहीं। वीपी सिंह ने साफ कहा था- 'वाजपेयी ने मुझे कभी नहीं कहा- मैं दल छोड़ना चाहता हूं।' यह वीपी सिंह ने किसी सवाल के जवाब में नहीं कहा। जब वाजपेयी ने वीपी सिंह के कहे का खंडन किया। तो खुद वीपी सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस कर लिखित बयान दिया। जिसमें उन ने यह बात अपने दस्तखतों से लिखी। पर अंग्रेजी अखबारों ने वीपी के बयान का मजमून पढ़ा ही नहीं। बयान का पहला पैरा ही खबर बना दिया। जिसमें कहा गया था- 'मंजिल से ज्यादा सफर में जो कुछ मैंने कहा है। इतिहास के सामने साक्षी के रूप में कहा है। और उसके हर अक्षर की मैं पुष्टि करता हूं।' हालांकि किताब के ज्यादातर अक्षरों का उसी बयान में खंडन था। पर बयान वीपी सिंह ने हिंदी में बांटा था। सो अंग्रेजीदा पत्रकारों ने ऊपर की दो-चार लाइनें पढ़कर खबर बना दी। हिंदी के अखबारों में वीपी सिंह का खंडन छपा। पुष्टि नहीं। यही सच था। पर वीपी सिंह के कुछ समर्थकों की सांसें फूल गईं। याद करिए वे दिन। जब वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं। देश में सामाजिक समरसता टूट गई थी। कुछ युवाओं ने आत्महत्या की। आजादी के बाद किसी सरकार ने पहले ऐसा कदम नहीं उठाया था। जिससे समाज में आक्रोश पैदा हो। आजादी से पहले जरूर ऐसी घटनाएं हुईं। जब बंग-भंग हुआ। तब भी लोग ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे। जब साइमन कमीशन की रपट आई थी। तब लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे। लाला लाजपत राय को लाठी पड़ी। उन्हें बचाया नहीं जा सका। तब क्रांतिकारियों ने सौगंध खाई थी- 'लालाजी के सिर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेजी शासन के ताबूत की एक-एक कील साबित होगी।' वह हुआ भी। जब वीपी सिंह ने समाज तोड़ने की बात की। तो कुछ खोजी पत्रकारों ने इतिहास खोज निकाला। एक पत्रकार ने पीढ़ी दर पीढ़ी इतिहास लिखा। जिसमें वीपी सिंह को 'जयचंद' की पीढ़ी का बताया गया। पर बात नए इतिहास की। जिसे वीपी सिंह ने रामबहादुर राय से इंटरव्यू में जमकर तोड़ा-मरोड़ा। अब देखिएगा। भले ही वीपी सिंह ने वाजपेयी के बारे में कही बात का खंडन कर दिया। पर वाजपेयी के कई पुराने विरोधी हायतौबा मचाएंगे। मठाधीश पत्रकार ताल ठोककर कहेंगे- 'हां, हम भी गवाह हैं। वाजपेयी भाजपा छोड़ना चाहते थे।' पर ये गवाह सिर्फ अफवाहों के होंगे। इतिहास के नहीं। उन अफवाहों को तो गुरुवार को अपन ने भी लिखा। पर अफवाहें कांग्रेस ने उड़ाई थी। कांग्रेस किसी से भयभीत थी। तो वाजपेयी से थी। यह बात भले ही आठ-नौ साल बाद सही। सच साबित हुई। जब 1998 में वाजपेयी कांग्रेस का विकल्प बने। कांग्रेस वाजपेयी से भयभीत थी। इसीलिए वाजपेयी पर क्या-क्या आरोप नहीं मढ़े। कांग्रेस ने तो 1998 के चुनाव में वाजपेयी को देशद्रोही भी कहा। तब भी कुछ मठाधीश पत्रकारों ने वाजपेयी के खिलाफ कलम चलाई थी। अंग्रेजों से माफीनामे की बात लिखी थी। पर वाजपेयी ने पुराने सारे दस्तावेज जारी कर दिए। तो न कांग्रेस के पास कोई जवाब था। न उन मठाधीश पत्रकारों के पास। वाजपेयी का तब भी चरित्र हनन हुआ। वही लोग आज भी चरित्र हनन में लगे हैं। ये वही लोग हैं। जो वाजपेयी को भाजपा का मुखौटा बताने वाले गोविंदाचार्य के संगी-साथी हैं। इंटरव्यूनुमा किताब में वीपी का महिमामंडन हुआ। पर यह कहीं नहीं लिखा- 'जब किसानों की अनदेखी पर देवीलाल ने इस्तीफा दे दिया। शरद यादव और पासवान साथ छोड़ देवीलाल के साथ जा रहे थे। तो वीपी सिंह ने सरकार बचाने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं।' वीपी सिंह सत्यवादी हरिश्चंद्र होते। तो जीवन की यह सचाई भी लिखते। पर शुकर यह- वीपी सिंह ने गुरुवार को वाजपेयी के बारे में सच बोल दिया। सोनिया के बारे में भी सच बोल दिया। पर कुछ मठाधीश पत्रकारों को यह सच नहीं पचा। उनमें कुछ अंग्रेजीदा हैं, तो कुछ हिंदी वाले भी। जो कुलबुलाते हुए वीपी सिंह की हवाई उड़ान की पुष्टि में लिखेंगे। पर खंडनों की बाढ़ ने किताब को तो रोक दिया। किताब के अंश अखबारों में छप गए। कुछ अंशों के पेज बंट गए। पर किताब मार्केट में नहीं आई। जब किताब का मतलब ही गलत निकल रहा हो। जब वीपी सिंह ने कुछ कहा ही न हो। इंटरव्यू लेने वाले ने ही अपने मन के अर्थ छपवा दिए हों। तो हल्ला मचना ही था। वीपी सिंह ने गुरुवार को जो बयान जारी किया। उसमें अखबारों में छपी खबरों का खंडन किया। अखबारों में किसने छपवाया था। जो वीपी सिंह ने कहा नहीं था। वह वीपी सिंह के नाम पर किसने छपवाया। यह अब खोज का मुद्दा बन चुका। पर अपन ने खोज-खबर की। तो पता चला। किताब छपते-छपते रुक गई। सिर्फ 14 किताबों की जिल्द बनी थी। चार वीपी सिंह ले गए थे। दस किताबें इंटरव्यू करने वाले लेखक रामबहादुर राय। बाकी किताबों की जिल्द रुक गई। क्या वीपी सिंह सुधार करवाना चाहते हैं? क्या सचमुच ऐसा होगा? या अफवाहों का पुलंदा ही मार्केट में आएगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115175519821782684?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115175519821782684/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115175519821782684' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115175519821782684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115175519821782684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/07/blog-post_01.html' title='वीपी सिंह की किताब मार्केट में आई क्यों नहीं'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-30322248.post-115139255436160461</id><published>2006-06-27T00:03:00.000-07:00</published><updated>2006-06-27T00:15:54.373-07:00</updated><title type='text'>जावेद अख्तर ने किया भारत का नाम रोशन</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अजय सेतिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;                 &lt;span style="color:#ff9900;"&gt;इंडिया गेट से&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंकियों ने जब संसद पर हमला किया। तो वाजपेयी ने सीमाओं पर फौज भेज दी। फौज महीनों डटी रही। आर-पार का फैसला नहीं हुआ। वाजपेयी ने कहा था- 'अब आर-पार होगा।' पर जब आरपार नहीं हुआ। तो वाजपेयी की खिल्ली उड़ाई गई। पर वाजपेयी ठहरे जन्मजात कवि। उनके मुंह से कवितामयी आर-पार शबद निकल गया था। उसका मतलब कोई यह नहीं था- अब यह भारत रहेगा या पाकिस्तान। मतलब सिर्फ इतना था- अब दुश्मनी होगी या दोस्ती। फौजें लंबे समय तक मोर्चो पर डटी रही। तब तक डटी रही। जब तक परवेज मुशर्रफ ढ़ीले नहीं हुए। वाजपेयी सार्क सम्मेलन में इस्लामाबाद गए। तो आर-पार का फैसला कर आए। परवेज मुशर्रफ को कहना पड़ा- 'पाकिस्तान अपनी जमीन से किसी आतंकवादी को न शह देगा, न प्रशिक्षण।' वाजपेयी का दबाव कारगर साबित हुआ। तो दोस्ती की बयार बहने लगी। वाजपेयी ने दोस्ती बढ़ाने के कुछ नए कदम उठाए। यह दोस्ती बढ़ाने के कदमों की दूसरी किश्त थी। पहली किश्त कारगिल से पहले लाहौर बस थी। दूसरी किश्त में दोनों देशों की जनता में रिश्ते सुधारने की बात हुई। इधर के छात्र उधर गए। उधर के शायर इधर आए। इधर के कवि उधर गए। वकील गए भी, आए भी। फिल्मी कलाकारों का भी आना जाना हुआ। पर पाकिस्तान ने जिसे चाहा वीजा दिया। जिसका चाहा रोक लिया। पाकिस्तान ने 'पीक एंड चूज' की नीति अपनाई। यानी पाक का दिल साफ नहीं हुआ। उसकी झलक अपन ने शुक्रवार को देख ली। जब जावेद अख्तर को वीजा नहीं मिला। पाकिस्तान में मुगल-ए-आजम रिलीज होनी थी। साथ में एक रंगारंग प्रोग्राम होना था। जिससे हुई आमदनी कश्मीर के भूकंप पीड़ितों के काम आती। कुल 22 कलाकार पाक जाने वाले थे। जावेद अख्तर उनमें से एक थे। पाक सरकार ने इक्कीस कलाकारों को वीजा दे दिया। सिर्फ जावेद अख्तर को नहीं दिया। जावेद अख्तर वही हैं। जिनने नरेंद्र मोदी के खिलाफ जमकर मोर्चा खोला था। पाकिस्तान ने जावेद को वीजा नहीं दिया। तो अपन को हैरानी हुई। जावेद को तो मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलने पर न्योता देना चाहिए था। वीजा क्यों नहीं दिया। अपन को समझ नहीं आया। अपन को याद आया। जब अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को वीजा नहीं दिया था। तो जावेद अख्तर जैसे लोग बहुत खुश थे। उस समय नटवर सिंह विदेश मंत्री थे। उन ने संसद में अमेरिकी फैसले की आलोचना की। तो वामपंथी भड़क गए थे। वामपंथी यों तो घोर अमेरिका विरोधी ठहरे। फिर भी अमेरिका के इस फैसले पर गदगद हो गए। जावेद अख्तर और शबाना विचारधारा से वामपंथी ठहरे। सो अपन ने वह किस्सा याद करवा दिया। पर बात जावेद को पाक के वीजा की। जावेद भले ही कई बार सांप्रदायिक दिखते हों। पर जावेद कट्टरवादी टाईप नहीं। वह हमेशा उन मुल्लाओं के खिलाफ रहे। जो मुसलमानों की धार्मिक भावनाएं भड़काते रहे। मुसलमानों को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करने के खिलाफ भी जावेद कम नहीं बोले। जावेद अख्तर एक सच्चे हिंदुस्तानी पहले हैं। मुसलमान बाद में। शायद यही बात पाक उच्चायोग को खटक गई। याद है- कुछ दिन पहले फिरोज खान पाक गए थे। तो उन ने मंच पर भारत की तारीफ की। सच बोल दिया। सच कड़वा होता है। सो पाकिस्तान की भौंहे तन गई। बताते जाएं। फिरोज खान ने क्या कहा था। उन ने कहा- 'पाकिस्तान के मुसलमानों से ज्यादा आजादी भारत में मुसलमानों को है।' हू-ब-हू यही विचार जावेद अख्तर के भी हैं। सो दूध का जला, जैसे छाछ को फूंक मार कर पीता है। वैसा ही पाकिस्तान ने किया। यह सच भी था। जब जावेद को वीजा नहीं मिला। तो उन ने कहा- 'मुझे तो समझ नहीं आया। इक्कीस लोगों को वीजा दे दिया। बाईसवें को नहीं दिया। हम लोकतंत्र में रहते हैं। हमें अभिवयक्ति की आदत हो चुकी। जहां लोकतंत्र नहीं होता। वहां लोगों को अभिव्यक्ति की आदत नहीं होती। शायद पाकिस्तान को अभिव्यक्ति की आदत वालों से डर लगता हो।' यों जावेद अख्तर ने फिरोज खान से भी ज्यादा बोला। पर पाक सरकार को बवाल मचने से होश आया। लगातार दो भारतीय मुसलमानों ने पाक का बाजा बजा दिया। अब तक भारतीय नेता भारतीय मुसलमानों को पाक परस्त समझते थे। सेक्युलर पार्टियां पाक से रिश्ते सुधारने की बात करती थी। ताकि भारतीय मुसलमान वोट दें। पर इन दोनों फिल्मी कलाकारों ने भारतीय मुसलमानों का कद बढ़ा दिया। जावेद और फिरोज ने दुनिया के सामने पाक के लोकतंत्र का भंडा फोड़ दिया। अभिव्यक्ति की आजादी नहीं होने का राज खोल दिया। तो पाक को लगा- इससे तो दुनिया भर में भद पिटेगी। सो कुछ ही घंटों में तस्वीर बदल गई। जावेद अख्तर को वीजा दे दिया गया। पर जावेद ने इससे पहले एलान करके भारतीयों का दिल जीत लिया। जब उन ने कहा- 'अब मैं तब तक पाक नहीं जाउंगा। जब तक मुझे न्योता नहीं मिलेगा। मैं खुद वीजा के लिए भीख नहीं मांगूंगा।' हू-ब-हू यही अमेरिकी वीजा न मिलने पर नरेंद्र मोदी ने कहा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/30322248-115139255436160461?l=india-gate.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://india-gate.blogspot.com/feeds/115139255436160461/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=30322248&amp;postID=115139255436160461' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115139255436160461'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/30322248/posts/default/115139255436160461'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://india-gate.blogspot.com/2006/06/blog-post.html' title='जावेद अख्तर ने किया भारत का नाम रोशन'/><author><name>INDIA GATE</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17840517597127617894</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry></feed>
